भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ३, अ० ६, ब्रा० ४, कं० २४-२५ शतपथब्राह्मण / ५२५ मर्त्य को प्रशंसित करेगा। तुझसे अन्य कोई सुख का दाता नहीं है। हे ऐश्वर्यवान्, मैं तुझसे यह वचन कहता हूँ।" यह मर्त्य ही था जो इसने यह कहा, अर्थात् तू ही इसको उत्पन्न करनेवाला है, तुझसे अन्य कोई दूसरा नहीं ॥२४॥ अब निग्राभ्य जलों से कई ग्रहों (प्यालों) को भरते हैं। जलों ने ही वृत्र को मारा था। उसी पराक्रम से जल बहते हैं। बहते हुओं से ही वसतीवरी को ग्रहण करता है, वसतीवरी से निग्राभ्य को, निग्राभ्य से ग्रहों को। उसी पराक्रम के द्वारा होता के चमसे से वह ग्रहों को लेता है। यह जो होता है, वह ऋक् है, ऋक् स्त्री है, स्त्री से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। इसलिए वह (इस सोम) को स्त्री, ऋक् होता से उत्पन्न कराता है। इसलिए वह होतृ के चमसे से ग्रहों को लेता है ॥२५॥ माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका' भाषा व्याख्या का अध्वरनाम तृतीय काण्ड समाप्त हुआ। तृतीय काण्ड प्रपाठक कण्डिका-संख्या प्रथम [ ३. २. १ ] १२४ द्वितीय [ ३. ३. ३ ] १२८ तृतीय [ ३. ४. ४ ] १२२ चतुर्थ [ ३. ६. १ ] १३२ पञ्चम [ ३. ७. ३ ] १२७ षष्ठ [ ३. ८. ४ ] ११२ सप्तम [ ३.६. ४ ] ११४ योग ८५६ पूर्वं के काण्डों का योग १३८७ पूर्णयोग २२४६ तृतीय काण्ड के विशेष शीर्षक अवान्तर दीक्षा [३।४।३]; उपसदिष्ट: [३।४।४]; महावेदिनामम् [३।५।१]; अग्निप्रणयनादि [३।५।२]; सदो हविर्धाननिर्माणानि [३।५।३]; उपरवनिर्माणम् [३।५।४]; सदस्यौदुम्बरी निखननम् [३।६।१]; धिष्ण्याँ निवापादि [३।६।२]; वैसर्जनहोम: [३।६।३]; अग्निषोमीय पशुप्रयोग:, तत्र यूपच्छेदनम् [३।६।४]; यूपोच्छ्रयणादि [३।७।१]; यूपैकादशिनी [३।७।२]; पशूपकरणादि [३।७।३]; पशुनियोजन प्रोक्षणादि [३।७।४]; पशु संज्ञपनम्; तत्रोपवेशनादि विधिः [३।८।१]; अग्निषोमीय वपायागः [३।८।२]; पशुपुरोडाशयागः [३।८।३]; उपयड्ढोमः [३।८।४]; पश्वेकादशिनी [३।६।१]; वसतीवर ग्रहणविधिः [३।६।२]; सवनीयपशुप्रयोगः [३।६।३]; सोमाभिषवः [३।६।४]।