शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० २०-२७ शतपथब्राह्मण / ५३१ अब वह 'हविर्धान' से बाहर आता है यह कहता हुआ कि मैं अन्तरिक्ष में होकर आता हूँ। अन्तरिक्ष में राक्षस दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित फिरता है। इसी प्रकार यह पुरुष भी दोनों ओर से स्वच्छन्द मूलरहित अन्तरिक्ष में फिरता है। यह यजुः है, राक्षस को मारनेवाली स्तुति । इसी स्तुति के द्वारा वह अन्तरिक्ष को निर्भय और राक्षस से मुक्त कर देता है ॥२०॥ अब वर मांगता है—देव इस ग्रह के होम को अत्यन्त चाहते हैं। और वे इसके लिए उसको वर देते हैं कि शीघ्र ही यह होम हमारे लिए दे देवे। इसलिए वर को माँगता है ॥२१॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"स्वां कृतोऽसि" (यजु० ७।३)—"यह ग्रह इसका प्राण है।" वह उसी का किया हुआ स्वयं उत्पन्न हुआ है, इसलिए कहा कि 'स्वांकृतः' अर्थात् अपने-आप बना हुआ है। "विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यः" (यजु० ७।३)—"सब प्रजाओं के लिए यह स्वयं ही बना है।" "मनस्त्वाष्टु" (यजु० ७।३)—"तुझको मन प्राप्त करे।" मन प्रजापति है, इसलिए इसका अर्थ हुआ कि प्रजापति तुझको पावे। "स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय" (यजु० ७।३)—"हे भलीभाँति उत्पन्न तुझ सूर्य के लिए स्वाहा।" इस प्रकार वह दूसरे देवता के लिए स्वाहाकार करता है ॥२२॥ यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसी में उसने आहुति दी है। यही सब-कुछ है। इसलिए वह उस (सूर्य) को सर्वोपरि बनाता है। यदि वह दूसरे स्वाहाकार को पहले देवता के लिए करता तो वह सूर्य से भी बड़ा हो जाता। इसलिए दूसरे स्वाहाकार को उसी देवता के लिए करता है ॥२३॥ अब आहुति देकर ग्रह को पोंछता है। इसमें वह जाते हुए प्राण को फिर रखता है। अब हथेली से मध्यपरिधि में वह पोंछा हुआ सोम लगाता है। इस प्रकार उसमें जाते हुए प्राण को धारण कराता है इस मन्त्र से —"देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः" (यजु० ७।३)—"किरणों को पीनेवाले देवों के लिए तुझको" ॥२४॥ उसी (सूर्यमंडल) में उसने आहुति दी है, जो कि तपता है। उसी की किरणें 'मरीचिपा' (प्रकाश का पान करनेवाली) हैं। उन्हीं को वह प्रसन्न करता है। उसी से प्रसन्न होकर देव उसे स्वर्गलोक को ले जाते हैं ॥२५॥ इस ग्रह के लिए न कोई अनुवाक्य है न याज्य । वह एक मन्त्र से आहुति देता है, इसी से वह अनुवाक्य और याज्य दोनों से युक्त हो जाता है। यदि वह कोई अभिचार करना चाहे तो सोम की डाली को चिपका ले, बाहों से, छाती से या कपड़े से, और इस मन्त्र से आहुति देवे— 'देवाऽशो यस्मै त्वेडे तत् सत्यमुंपरिप्लुता भङ्गेन हतोऽसौ फट्"—"हे दिव्य सोम ! जिस काम के लिए मैं तेरी स्तुति करता हूँ, वह पूरा होवे। और अमुक पुरुष (मेरा शत्रु) नष्ट हो जाय।" जिस प्रकार मारे जानेवाले शत्रुओं में से कोई भाग जाता है, इसी प्रकार सोम की कुचली जानेवाली शाखाओं में से यह एक बच सकती है। जो इस प्रकार करता है उसका कोई शत्रु भागकर बचने नहीं पाता। इस मन्त्र से वह ग्रह को रख देता है—"प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह ग्रह इस यज्ञ का प्राण है ॥२६॥ कुछ लोग इसको दक्षिण की ओर रखते हैं। वे कहते हैं कि इसी दिशा में सूर्य चलता