भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 699 में से

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का० ४, अ० १, ब्रा० २. कं० ८-१७ शतपथब्राह्मण / ५३५ देव इससे ऊपर हैं क्योंकि वे द्युलोक में हैं ॥८॥ उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि इसी पृथिवी के साथ लिये जाते हैं। इसी योनि में वे रक्खे जाते हैं क्योंकि पृथिवी योनि है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥९॥ ऋत्विज लोग रेत (वीर्य) के रूप में सोम को रखते हैं। जो रेत योनि के बाहर जाता है वह खराब हो जाता है और जो योनि में रहता है वह ठीक रक्खा जाता है ॥१०॥ ये दोनों ग्रह उसके प्राण और उदान हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे देता है और दूसरे की पहले, जिससे प्राण और उदान अलग-अलग रहें। इस प्रकार वह प्राण और उदान को अलग-अलग रखता है। इसलिए ये दोनों अर्थात् प्राण और उदान एक होते हुए भी अलग-अलग कहे जाते हैं ॥११॥ ये दोनों ग्रह उसके लिए रात और दिन हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे दी जाती है और दूसरे की पहले-रात और दिन को अलग-अलग करने के लिए। इस प्रकार वह रात और दिन को अलग-अलग करता है ॥१२॥ उपांशु दिन है, उसकी आहुति रात में देता है। इस प्रकार दिन को रात्रि में रखता है। इसलिए अन्धकार-से-अन्धकार में भी कुछ तो दिखाई देता ही है ॥१३॥ अन्तर्याम रात है। उसकी आहुति दिन में देता है। इस प्रकार रात को दिन में रखता है। इसलिए यह सूर्य उदय होकर इन प्रजाओं को नहीं जलाता। इसी से यह प्रजा सुरक्षित रहती हैं ॥१४॥ वह उसमें से अन्तर्याम ग्रह को इस मन्त्र से लेता है—"उपयामगृहीतोऽसि” (यजु० ७।४)—"तू उपयाम अर्थात् 'सहारे (आश्रय)' के साथ लिया हुआ है।" यह 'उपयाम' का योग कहा। "अन्तर्यच्छ मघवन् पाहि सोमम्” (यजु० ७।४)—'मघवा' है इन्द्र या यज्ञ का नेता, इसलिए कहा कि "हे इन्द्र, सोम की रक्षा कर।" "उरुष्य राय एषो यजस्व" (यजु० ७।४)— "पशु राय हैं अर्थात् पशुओं की रक्षा कर।" प्रजा इष हैं, इस प्रकार प्रजा को यज्ञ के इच्छुक बनाता है जिससे ये प्रजा यज्ञ करते हुए, अर्चन करते हुए और श्रम करते हुए रहें ॥१५॥ “अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधामि । अन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् । सजूर्देवैभिरवरैः परैश्च" (यजु० ७।५)—"तेरे भीतर द्यौ और पृथिवी को रखता हूँ। तेरे भीतर विस्तृत अन्तरिक्ष को। देवों से युक्त निचले और ऊँचे।" इस प्रकार इस ग्रह को सब देवों से सम्बन्धित करता है। यह सब देवों का इसलिए है कि इसी से यह प्रजा प्राण और उदान लेती है और अन्तरिक्ष में चलती हैं। "अन्तर्यमि मघवन् मादयस्व" (यजु० ७।५)—"हे मघवन् ! अन्तर्याम में आनन्द करो।" मघवा इन्द्र है। इन्द्र यज्ञ का नेता है इसलिए कहा 'मघवा'। यह जो "अन्तः-अन्तः” कहकर उसे लेता है इसका अर्थ यह है कि 'मैं तुझे आत्मा के भीतर रखता हूँ' ॥१६॥ उस ग्रह को लेकर पोंछता है कि इसमें से कुछ सोम टपक न जाय। वह इसको रखता नहीं। यह उदान है। इसीलिए उदान निरन्तर चलता रहता है। यदि उसको कुछ पुरश्चरण करना हो तो कहे, 'अमुक पुरुष के उदान ! मैं तुझको रखता हूँ' ॥१७॥

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