शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० १, ब्रा० २-३, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ५३६ करना चाहते हैं ॥२६॥ यह पृथिवी उपांशु है। उपांशु प्राण है। प्राण के द्वारा ही तो प्राणी पृथिवी पर साँस लेता है। अन्तर्याम द्यौ है, क्योंकि अन्तर्याम उदान है। उदान से ही प्राणी द्यौ में साँस लेता है। उपांशु- सवन व्यान है। उपांशु-सवन अन्तरिक्ष है, क्योंकि अन्तरिक्ष में ही प्राणी व्यान-वायु को छोड़ता है ॥२७॥ ऐन्द्रवायवग्रहः अध्याय १—ब्राह्मण ३ ऐन्द्र-वायव ग्रह उसकी वाणी है और वह उसका आत्मा है। इन्द्र ने जब वृत्र के लिए वज्र मारा तब उसने समझा कि 'मैं निर्बल हूँ, मैं उसे मार नहीं पाया।' इसलिए वह छिप गया। अन्य देवता भी वहीं छिप गये ॥१॥ उन देवों ने कहा, 'हम नहीं जानते कि वृत्र मारा गया या नहीं। हममें से एक को देखना चाहिए कि वह मारा गया या नहीं' ॥२॥ उन्होंने वायु से कहा, इसी वायु से जो बहता है—'हे वायु, पता तो लगा कि वृत्र जीता है या नहीं ? हम लोगों में तू सबसे अधिक तेज है। यदि वह जीता होगा तो जल्दी से भाग आ सकता है' ॥३॥ वायु ने कहा, 'इससे मुझे क्या लाभ ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'सोम राजा का प्रथम वषट्कार तुझे मिलेगा।' उसने कहा 'अच्छा' और वह गया। वृत्र तो मर चुका था। उसने कहा, 'वृत्र मर चुका है। जो मरे हुए के लिए किया जाता है उसे कीजिए' ॥४॥ देवता वहाँ दौड़े गये जैसे धन की इच्छा में लोग दौड़ते हैं। उसमें से जिसको एक देवता ने पकड़ा वह एक-देवत्य हुआ, जिसे दो ने पकड़ा वह द्विदेवत्य, जिसको बहुतों ने पकड़ा वह बहुदेवत्य। चूंकि उसको पात्रों के द्वारा ग्रहण किया इसलिए इनका नाम ग्रह पड़ा ॥५॥ उसमें से उनको दुर्गन्ध आई। वह खट्टा और सड़ा प्रतीत हुआ। वह न आहुति के योग्य था, न भक्षण के ॥६॥ देवों ने वायु से कहा, 'हे वायो ! इसमें होकर बह। इसको हमारे लिए स्वादिष्ट कर दे।' उसने कहा, 'मुझे क्या लाभ?' उन्होंने कहा कि, 'इन ग्रहों का नाम तेरे ही नाम पर पड़ेगा।' उसने कहा, 'अच्छा ! परन्तु मेरे साथ तुम भी फूंको' ॥७॥ देवों ने उसकी जितनी दुर्गन्ध निकाल दी उतनी पशुओं में रख दी। यह वही बदबू है जो मुर्दा पशुओं में पाई जाती है। इस दुर्गन्ध पर नाक नहीं सिकोड़ना चाहिए, क्योंकि यह सोम राजा की गन्ध है ॥८॥ उस पर थूकना भी नहीं चाहिए। चाहे उस पर कितना ही असर क्यों न हुआ हो, उसको वायु की ओर मुड़ जाना चाहिए। सोम का अर्थ है बड़ाई और रोग का अर्थ है बुराई। जिस प्रकार बड़े के आने पर छोटा दब जाता है, इसी प्रकार सोम के आने पर रोग दब जाता है ॥६॥ अब वायु ने फिर फूंका। वह स्वादिष्ट हो गया--आहुति के भी योग्य और भक्षण के