भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० १, ब्रा० ३, कं० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५४१ भी योग्य। इसलिए यह ग्रह भिन्न-भिन्न देवताओं के होते हुए भी वायु के ही कहे जाते हैं। सोम राजा का पहला वषट्कार भी वायु का है और ये ग्रह भी वायु के ही कहे जाते हैं ॥१०॥ इन्द्र ने सोचा—हमारे इस यज्ञ का सबसे बड़ा भाग तो वायु का हो गया, क्योंकि सोम राजा का पहला वषट्कार उसका है। इसके अतिरिक्त ये ग्रह भी उसी के नाम से पुकारे जाते हैं। इनमें से मैं भी भाग लूंगा ॥११॥ उसने कहा, 'वायु ! इस ग्रह में मुझे भी भाग दे ।' 'मुझे क्या लाभ ?' 'वाणी व्यक्त हो जायगी।' 'यदि वाणी व्यक्त हो जायगी तो मैं तुझे भाग दे दूंगा।' इसलिए इस ग्रह का नाम ऐन्द्रवायव पड़ा। पहले केवल इन्द्र का ही था ॥१२॥ इन्द्र ने कहा, 'इस ग्रह का आधा मेरा ।' वायु ने कहा, 'इस ग्रह का चौथाई तेरा।' इन्द्र ने कहा, 'आधा मेरा।' वायु ने कहा, 'चौथाई तेरा' ॥१३॥ वे दोनों फैसले के लिए प्रजापति के पास गये। उस प्रजापति ने ग्रह के दो भाग कर दिये। उसने कहा, 'यह वायु का।' फिर आधे के दो भाग किये, और कहा, 'यह वायु का और यह तेरा।' तब उसने अपने भाग का चौथाई इन्द्र को दिया। चतुर्थ और तुरीय का एक अर्थ है। इसलिए इसका नाम ऐन्द्र-तुरीय ग्रह हो गया ॥१४॥ इस ग्रह के दो पुरोरुच मन्त्र होते हैं—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी; दो प्रैष—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु सम्बन्धी; दो याज्य—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी। इस प्रकार वह सदा इन्द्र के लिए चौथाई भाग रखता है ॥१५॥ उसने कहा कि अगर मुझे चौथाई भाग दिया है तो वाणी भी चौथाई भाग ही स्पष्ट बोलेगी। इससे केवल यही चौथाई वाणी समझ में आती है जो मनुष्य बोलता है, और जिस चौथाई को पशु बोलते हैं वह समझ में नहीं आती। वह चौथी वाणी समझ में नहीं आती जिसे पक्षी बोलते हैं और वह चौथाई वाणी भी समझ में नहीं आती जिसको क्षुद्र कीड़े बोलते हैं ॥१६ इसीलिए ऋषि ने कहा, “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनी- षिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति” (ऋ० १।१६४।४५)— “वाणी से परिमित चार पद होते हैं। बुद्धिमान्, ब्राह्मण उनको जानते हैं। तीन गुहा में रक्खे हुए स्पष्ट नहीं होते हैं। चौथाई वाणी को मनुष्य बोलते हैं” ॥१७॥ अब उस (सोम) में से ग्रह को मारता है, इस मन्त्र से—“आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार। उपो ते ऽअन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा” (यजु० ७।७, ऋ० ७।६२।१)—“हे शुद्ध व्यान करनेवाले वायु, आ। तेरे हजारों अश्व हैं। तू सब वरों का दाता है। हे देव, जिसका तू पहला घूंट पीता है वह आनन्द-युक्त रस तुझको अर्पण किया गया” ॥१८॥ इस ग्रह को लेकर फिर भरता है, इस मन्त्र से—“इन्द्र वायू ऽ इमे सुता ऽ उप प्रयो-