भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० १, ब्रा० ५, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ५४७ इससे मैं उसका प्रतीकार करता हूँ । अब मेरे लोग ठीक रहें।' तब से वे लोग ठीक रहे । लेकिन मनुवंशी शर्याति वहाँ से चलता बना कि कहीं मैं इसे फिर अप्रसन्न न कर दूँ ॥७॥ उसी समय चिकित्सा करते-करते अश्विन आ निकले । उन्होंने सुकन्या को ग्रहण करना चाहा परन्तु वह राजी न हुई ॥८॥ वे दोनों बोले, 'सुकन्या, तू किस जीर्ण नाचीज पुरुष के पास रहती है ? हमारे पास आ।' वह बोली, 'मेरे पिता ने मुझे जिसके साथ ब्याहा है उसी के पास रहूँगी, जब तक यह जीवित है।' ऋषि को यह बात मालूम हो गई ॥६॥ वह बोला, 'सुकन्या, इन दोनों ने तुझसे क्या कहा ?' उसने उससे सब-कुछ कह दिया । यह सुनकर उसने कहा, 'अगर तुझसे ये फिर कहें तो उनसे कहना कि तुम दोनों पूर्ण तो हो नहीं फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ? यदि वे पूछें कि किस बात में हम कम हैं या निर्बल हैं तो कहना कि पहले मेरे पति को युवा कर दो तब कहूँगी।' वे फिर उसके पास आये और उससे वही बात कही ॥१०॥ वह बोली, 'तुम न तो पूर्ण हो, न समृद्धवान् । फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ?' वे दोनों बोले, 'हम किस बात में कम हैं ? किस बात में निर्बल हैं ?' वह बोली, 'मेरे पति को युवा कर दो तब मैं बताऊँ' ॥११॥ वे बोले, 'उस तालाब में इसको ले जा, यह जिस अवस्था की कामना करेगा उसी अवस्था का होकर निकलेगा।' वह उसको तालाब पर ले गई। उसने जिस आयु की कामना की, उसी आयु का होकर निकला ॥१२॥ वे बोले, 'सुकन्या, हम किस बात में अधूरे हैं, किसमें कम हैं?' तब ऋषि ने स्वयं उत्तर दिया, 'कुरुक्षेत्र में देव यज्ञ करते हैं और तुमको बाहर निकाल दिया है। यही तुममें अधूरापन है, यही कमी है।' यह सुनकर ये दोनों अश्विन लौट गये । वे वहाँ पहुँचे जहाँ देवों ने बहिष्पवमान स्तुति करने के पश्चात् यज्ञ रच रक्खा था ॥१३॥ वे बोले, 'हमको भी यज्ञ में बुलाओ।' देव बोले, 'हम नहीं बुलाते। तुम तो चिकित्सा करते-करते सब प्रकार मनुष्यों में फिरते रहे हो' ॥१४॥ वे बोले, 'अरे तुम तो बे-सिर के यज्ञ को करते हो?' 'बे-सिर का कैसे?' 'हमको बुलाओ तब हम बतायेंगे।' 'अच्छा।' उन्होंने उन अश्विनों का आवाहन कर लिया और उनके लिए इस आश्विन-ग्रह को लिया । ये दोनों यज्ञ के अध्वर्यु हो गये । उन्होंने यज्ञ को सिर-वाला बना दिया । 'दिवाकीत्यों' के ब्राह्मण में लिखा है कि उन्होंने यज्ञ के सिर को किस प्रकार सम्पादित किया । इसलिए बहिष्पवमान की स्तुति के पश्चात् यह ग्रह लिया जाता है, क्योंकि बहिष्पवमान