शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० २, ब्रा० १, क० ५-१२ शतपथब्राह्मण / ५५१ जब देवों ने असुर राक्षसों को मार भगा दिया तो वे इन दोनों को न भगा सके। देवता जो कुछ करते, ये दोनों उनमें विघ्न डालते और फिर झट से भाग जाते ॥५॥ तब देवों ने कहा-‘क्या तुम कोई उपाय कर सकते हो कि इन दोनों को भगा सकें?’ वे कहने लगे-‘इन दोनों के लिए दो ग्रह लें। वे इन दोनों को लेने के लिए आवेंगे। हम इनको पकड़कर मार भगायेंगे।’ उन दोनों के लिए ग्रह लिये और जब वे आये तो उनको पकड़कर मार भगाया। इसलिए षण्ड और मर्क के लिए ये दो ग्रह लिये जाते हैं और देवताओं के लिए इनकी आहुति दी जाती है ॥६॥ याज्ञवल्क्य ने यह भी कहा है कि हम इनको देवताओं के लिए ही क्यों न न लें। यह तो जीत का चिह्न है। परन्तु उन्होंने इतनी मीमांसा मात्र की है। व्यवहार में इसको कभी नहीं लाये ॥७॥ कुछ लोग इस ऋचा को शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति में लाते हैं, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्नि- गर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने” (यजु० ७।१६)—यहाँ ‘ज्योतिर्जरायुः’ (प्रकाश है जरायु जिसका) कहा, इससे तात्पर्य यह है कि वह इसको तपनेवाले सूर्य के समान करता है ॥८॥ परन्तु शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति इस मन्त्र से होनी चाहिए, “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्व- थेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद॑ स्व॒र्विदम्” (यजु० ७।१२, ऋ० ५।४४।१)—“पुरानी रीति से, पहली रीति से, सब रीति से, आजकल की रीति से बड़े, यज्ञधारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले यजमान को।” यह शुक्र खानेवाला है, और खानेवाला ही बड़ा है। इसलिए कहा कि ‘बड़े, यज्ञ- धारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले को’। “प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे। उपयामगृहीतोऽसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाहि” (यजु० ७।१२)—“जो उपस्थित है, बलवान् है, शत्रुओं को जीतनेवाला और शीघ्रगामी है, ऐसे यजमान को तू दुहता है उन यज्ञ- क्रियाओं में जिनमें तू बढ़ता है। तुझे रक्षा के लिए ग्रहण किया गया है। षण्ड के लिए तुझे। यह तेरी योनि है। तू वीरता की रक्षा कर।” यह पढ़कर वह रख देता है। यह खानेवाला है। खाने- वाला वीर होता है। इसलिए कहा कि ‘यह तेरी योनि है, तू वीरता की रक्षा कर।’ दक्षिण के कोने में इसको रखता है, क्योंकि इसी दिशा में सूर्य चलता है ॥६॥ अब इस मन्त्र से मन्थी को लेता है, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने। इममपा॑७ संगमे सूर्यस्य, शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति। उपयामगृहीतोऽसि मर्काय त्वा” (यजु० ७।१६)—“यह वेनः (चन्द्र) पृश्निगर्भा (द्यौलोक या सूर्य के सहारे स्थित) ज्योतिर्ज- रायु (ज्योति से लिपटा हुआ), (विमाने) अन्तरिक्ष में (रजसः) जलों को (चोदयत्) प्रेरणा करता है। विद्वान् लोग शिशु के समान इसकी सूर्य के जलों के साथ संगम के समय में बुद्धियुक्त वाणियों से स्तुति करते हैं। रक्षार्थ लिया. गया है। मर्क के लिए तुझको” ॥१०॥ उसमें सत्तू मिलाता है। सत्तू इसलिए मिलाता है कि वरुण ने सोम राजा की आँख में मारा और वह सूज गई (अश्वयत्)। उसमें से अश्व (घोड़ा) निकला। चूंकि यह सूजन में से निकला इसलिए इसका ‘अश्व’ नाम पड़ा। उसका एक आँसू गिरा। उसमें से जौ उत्पन्न हुए। इसलिए जौ (वरुण) वरुण का समझा जाता है। इस प्रकार आँख का जितना भाग उस समय दुख गया था उसी की पूर्ति करता है। उसे चंगा करता है। इसलिए सत्तूओं को मिलाता है ॥११॥ वह इस मन्त्र से मिलाता है, “मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता। आ यः शर्याभिस्तु विन्दुमणो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ” (यजु० ७।१७, ऋ० १।६१।३) “जिन