शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / ५५३ हवनों में विचार के समान तेज तुम दोनों अध्वर्यु कर्म के द्वारा जाते हो। जिस बहुत धनवाले अध्वर्यु ने अंगुलियों से हाथ में लिये हुए (मन्थि में) सत्तू मिलाये हैं।" इस मन्त्र से रख देता है, “एष ते योनिः प्रजाः पाहि” (यजु० ७।१७) - "यह तेरी योनि है। प्रजा को पाल।" यह ग्रह खाद्य है। यह प्रजा भी खाद्य है। इसलिए कहा कि यह योनि है, तू प्रजा को पाल ॥१२॥ यूप के दो टुकड़े प्रोक्षित (जल छिड़के) होते हैं और दो अप्रोक्षित (बिना जल के छिड़के)। अध्वर्यु एक प्रोक्षित और एक अप्रोक्षित लेता है। इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता भी एक प्रोक्षित और अप्रोक्षित लेता है। अध्वर्यु शुक्र को लेता है और प्रतिप्रस्थाता मन्थि को ॥१३॥ अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों राक्षसों को इस प्रकार निकालते हैं कि अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल से उस ग्रह को मांजता है और कहता है 'अपमृष्टः शंडः' (शंड भगा दिया गया) और इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता कहता है 'अर्क भगा दिया गया'। अध्वर्यु यह कहकर बाहर जाता है, “देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्तु"- "शुक्र पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर बाहर जाता है, “देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्तु"- "मन्थि पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" इस प्रकार ये दोनों देवताओं के निमित्त हवियों को ले जाते हैं ॥१४॥ वे दोनों आहवनीय के पीछे उत्तर वेदी पर (दाहिनी हाथ की) कुहनी मिलाकर उन ग्रहों को रखते हैं। दक्षिण श्रोणी में अध्वर्यु रखता है और उत्तर में प्रतिप्रस्थाता बिना छोड़े हुए, यह कहकर, “अनाधृष्टाऽसि" (यजु० ७।१७) - "तू आक्रमण से सुरक्षित है।" इस प्रकार ये दोनों वेदी को राक्षसों से सुरक्षित करते हैं। ये अग्नि की परिक्रमा करनेवाले हैं। इसलिये इनको प्रसन्न करता है। इस प्रकार जब वे परिक्रमा करते हैं तो अग्नि इनको नहीं सताती ॥१५॥ अध्वर्यु इस मंत्र से परिक्रमा करता है, "सुवीरो वीरान् प्रजनयन्" (यजु० ७।१३)— "वीर वीरों को उत्पन्न करता हुआ।" यह हवि खानेवाले की स्थानी है और खाने वाला वीर है। इसलिए कहा कि वीरों को उत्पन्न करता हुआ। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्” (यजु० ७।१३)-"यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१६॥ प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से परिक्रमा करता है, "सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्” (यजु० ७।१८) - "अच्छी प्रजावाले, प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए।" यह हवि खाद्य का स्थानी है, और ये प्रजा के लोग खाद्य हैं। इसलिए कहा कि प्रजा को उत्पन्न करते हुए। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्" (यजु० ७।१८)- "यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१७॥ वे दोनों ग्रहों को (हाथ से) ढककर ले जाते हैं। वह इनको छिपा लेता है। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र आगे की ओर चले जाते हैं तो छिप जाते हैं। (यूप के) सामने जाकर वे (ग्रहों को) खोल देते हैं और सम्मुख खड़े होकर आहुति देते हैं। इससे वे उनको 'दृष्ट' बनाते हैं। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र पीछे लौटते हैं तो उसको सब कोई देखता है। इसीलिए जब वीर्य सींचा जाता है तो कोई नहीं दिखता, परन्तु जब उत्पत्ति होती है तो सब देखते हैं ॥१८॥ वे यूप के पीछे अपनी कुहनियां रखते हैं कि कहीं आग भड़क न उठे। लेकिन अगर आग भड़क उठे तो यूप के सामने कुहनी कर लें— अध्वर्यु इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या