भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० २, ब्रा० २-३, कं० १३-१६ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६१ ७।२१)- "यजमान के लिए पवित्र करता है।" यह यजमान के लिए कहा ॥१३॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि इतना ही कहकर ग्रह को रख दे, जितना ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य है। वह सब इतना ही तो है। इन्द्र और अग्नि यह सब है। इसलिए इतना ही कहकर रख दे ॥१४॥ परन्तु इतना और कहना चाहिए "इष ऽ ऊर्जे पवते।" 'इषे' कहा वृष्टि के लिए। 'ऊर्जे' कहा रस के लिए, क्योंकि वृष्टि से रस उत्पन्न होता है। "अद्भ्य ऽ ओषधीभ्यः पवते" (यजु० ७।२१)- यह जलों और ओषधियों के लिए कहा। "द्यावापृथिवीभ्यां पवते" (यजु०७।२१)- यह द्यौ और पृथिवी के लिए कहा जिसके आश्रित सभी हैं। "सुभूताय पवते" (यजु० ७।२१)- अर्थात् 'साधु या भलाई के लिए' ॥१५॥ कुछ कहते हैं कि 'ब्रह्मवर्चसाय पवते', परन्तु ऐसा न कहना चाहिए। क्योंकि ऊपर 'अस्मै ब्रह्मणे' कहा जा चुका है। इसका अर्थ 'ब्रह्मवर्चस्' है। "विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः" (यजु० ७।२१) - "तुझको विश्वेदेवों के लिए। यह तेरी योनि है। तुझको विश्वेदेवों के लिए।" उस ग्रह को रख देता है कि इसको विश्वेदेवों के लिए भरा था। उसको मध्य में रखता है, क्योंकि यह इसका आत्मा है। आत्मा मध्य में है। दाहिनी ओर उक्थ्य थाली को रखते हैं, बाईं ओर आदित्य थाली को ॥१६॥ उक्थ्यग्रहः अध्याय २--ब्राह्मण ३ यह जो उक्थ्य ग्रह है वह इसका अनिरुक्त (अस्पष्ट) आत्मा है। यह उसका आत्मा है। यह इसका जो अनिरुक्त प्राण है वह इसका आत्मा है। यह इसकी आयु है। इसलिए वह इसको इस (पृथिवी) के द्वारा ग्रहण करता है। इसी की थाली होती है (अर्थात् थाली मिट्टी की ही तो बनती है) और थाली में ही इसको निकालता है। यह पृथिवी अजर-अमर है। अजर-अमर ही आयु है। इसलिए इस पृथिवी के द्वारा इसको ग्रहण करता है ॥१॥ उसको पूरा-पूरा भरता है। यह जो आयु है वह 'सब' है। इसलिए पूरा-पूरा भरता है ॥२॥ ध्रुव ग्रह उसकी आयु है। इसी से उसका आत्मा सुगठित रहता है। पर्व अर्थात् जोड़ इसी के द्वारा संगठित रहते हैं। अभी अच्छावाक (ऋत्विज विशेष) के लिए पिछला ग्रह भरा नहीं जा चुका ॥३॥ तभी सोम राजा को (गाड़ी से) उतारता है और वसतीवरियों का तीसरा भाग (आधवनीय स्थाली में) छोड़ता है, इस प्रकार पर्व जुड़ता है अर्थात् इस उक्थ्य ग्रह को पिछले सवन का पहला और पहले सवन का पिछला ग्रह बना देता है (इस प्रकार दोनों सवन जुड़ गये), जो पिछले सवन का है उसे पहले करता है, जो पहले का है उसे पीछे। इस प्रकार वह एक का दूसरे में जोड़ मिला देता है, इसीलिए तो शरीर के जोड़ एक-दूसरे में मिले हुए हैं (व्यतिषक्तानि- interlocked), यह इस प्रकार; यह इस प्रकार (हाथ के इशारे से बताकर) ॥४॥ इसी प्रकार दोपहर के सवन में, चूंकि अभी इसमें से अच्छावाक के लिए पिछला ग्रह भरा नहीं जाता। इसलिए वसतीवरियों का तीसरा भाग (आधवनीय में) छोड़ता है। इस प्रकार जोड़ मिल जाता है। पहले को वह पिछले सवन का बनाता है और पिछले को पहले सवन

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