भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 583

कां० ४, अ० २, ब्रा० ३-४, कं० १४-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / ५६५ “इन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि” (यजु० ७।२३) — “यह भाग आच्छा- वाक का है। इसकी स्तुति के मन्त्रों में इन्द्र-अग्नि आता है, इन्द्र-अग्निवाले मन्त्र ही शस्त्र में पढ़े जाते हैं और इन्द्र-अग्नि के मन्त्रों से ही आहुति दी जाती है। 'इन्द्राय त्वा' से दोपहर के सवन को करता है, क्योंकि दोपहर का सवन इन्द्र का होता है ॥१४॥ चरकाध्वर्यु इसको इस प्रकार बाँटते हैं, “उपयामगृहीतोऽसि देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य उक्थाव्यं मित्रावरुणाभ्यां जुष्टं गृह्णामि”— “तू आश्रय के लिए है। तुझ देव के अर्पण को देवों के लिए जिनको स्तुति प्रिय है, मित्र-वरुण के लिए लेता हूँ।” अब वह इस मन्त्र से ग्रह को रखता है, “एष ते योनिर्मित्रावरुणाभ्यां त्वा।” यह कहकर थाली को छूता है, 'हविरसि'— 'तू हवि है' ॥१५॥ इस मन्त्र से रखता है, “उपयामगृहीतोऽसि देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य उक्थाव्य- मिन्द्राग्निभ्यां जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा।” यह कहकर थाली को छूता है। “पुनर्हवि- रसि।” — “तू फिर हवि है” ॥१६॥ उपयामगृहीतोऽसि। देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य उक्थाव्यमिन्द्राग्निभ्यां जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा।' इससे रखता है। परन्तु 'पुनर्हविरसि' कहकर इस बार थाली को नहीं छूता। 'इन्द्राय' 'इन्द्राय त्वा' कहकर दोपहर के सवन को करता है क्योंकि दोपहर का सवन 'इन्द्र' का है। 'तू हवि है' ऐसा कहकर थाली को दो बार छूता है, तीसरी बार चुपके से रख देता है ॥१७॥ इसको 'उपयाम······इति' कहकर न ले और न 'योनि' में रक्खे। यह तो पहले ही 'उपयाम····' से ली जा चुकी है और पहले ही 'योनि' में रक्खी जा चुकी है। यदि अब भी 'उपयाम······' से लेगा और 'योनि' में रक्खेगा तो एक ही चीज को दुहराने का दोषी होगा। 'पुनर्हविरसि' कहकर थाली को छूने से इस ग्रह को दोबारा ग्रहण करना पड़ेगा। इसलिए इसको न करे। चुपके से रख दे ॥१८॥ ध्रुवग्रहः अध्याय २—ब्राह्मण ४ यह जो आगे का प्राण है वह वैश्वानर ग्रह है, और यह जो पीछे का प्राण है वह ध्रुव है। पहले ये दोनों ग्रह लिये जाया करते थे— ध्रुव भी और वैश्वानर भी। इनमें से एक अब भी निकाला जाता है अर्थात् ध्रुव। उस अर्थात् वैश्वानर ग्रह को यदि चरकों की रीति के अनुसार लिया जाय तो उसको यजमान के चमसे में डालना चाहिए, 'ध्रुव' को होता के चमसे में ॥१॥ यह जो नाभि से नीचे का स्थान है उसी का आत्मा, उसी की आयु यह ध्रुव ग्रह है। इसलिए उसको इसे भूमि द्वारा ही लेता है क्योंकि थाली इसी की मिट्टी की होती है। थाली में ही इसे लेना है। यह अजर-अमर है। आयु भी अजर-अमर है। इसलिए इसके द्वारा लेता है ॥२॥ उसको पूरा-पूरा भरता है। 'सब' पूर्ण है। यह जो आयु है वह पूर्ण है। इसलिए पूरा- पूरा भरता है ॥३॥