शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ३, ब्रा० १, कं० ८-१७. शतपथब्राह्मण / ५७६ ही आई हुई है, दिन हो या रात हो। दुबारा वषट्कार भी नहीं कहता कि कहीं ऋतुओं को वापस न कर दे। (अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता) पहले ग्रहों को साथ-साथ लेते हैं, और पिछलों को भी साथ-साथ। यह 'सब' संवत्सर द्वारा ग्रहण हो जाता है। यह 'सब' संवत्सर में शामिल है ॥८॥ एक (हविर्धान के) बाहर जाता है; दूसरा भीतर आता है। इसलिए एक मास के बाद दूसरा आता है (एक जाता, दूसरा आता है)। यदि दोनों साथ निकलें और साथ घुसें तो ये महीने अलग-अलग गुजरा करें। इसलिए एक बाहर जाता है और दूसरा भीतर आता है ॥९॥ वे दोनों 'ऋतु के लिए' छः बार आहुति देते हैं। इसी से देवों ने दिन बनाया। 'ऋतुओं के लिए' इससे चार बार। इससे उन्होंने रात बनाई। यदि इतना ही होता तो रात ही होती, यह कभी समाप्त न होती ॥१०॥ 'ऋतुना' इससे दो बार आहुति देता है। इससे देवों ने फिर दिन दिया। इसलिए अब दिन है, फिर रात होगी। फिर कल ॥११॥ 'ऋतुना' (ऋतु से) देवों ने मनुष्यों को उत्पन्न किया, 'ऋतुभिः' (ऋतु से) पशुओं को। पशुओं को मनुष्यों के बीच में बनाया, इसलिए पशु दोनों ओर से घिरकर मनुष्यों के वश में हो गये ॥१२॥ 'ऋतुना' इससे छः बार आहुति देकर पात्रों को दूसरी ओर लौट देते हैं। 'ऋतुभिः' इससे चार बार आहुति देकर पात्रों को दूसरी ओर लौट देते हैं। एक ओर से देवों ने दिन बनाया, दूसरी से रात। एक ओर से देवों ने मनुष्य बनाया, दूसरी ओर से पशु ॥१३॥ वह इन (ऋतु-ग्रहों को द्रोण कलश से) लेता है। "उपयामगृहीतोऽसि मधवे त्वा" (यजु० ७।३०)-इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयामगृहीतोऽसि माधवाय त्वा" (यजु० ७।३०)- -इससे प्रतिप्रस्थाता। 'मधु और माधव' ये दो वसन्त के महीने हैं। क्योंकि वसन्त में ही ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और वनस्पति पकती हैं, इसलिए यह मधु और माधव हैं ॥१४॥ "उपयामगृहीतोऽसि शुक्राय त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम- गृहीतोऽसि शुचये त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों ग्रीष्म के महीने हैं, इनमें धूप कड़ी होती है, इसलिए यह शुक्र और शुचि दो महीने हुए ॥१५॥ "उपयामगृहीतोऽसि नभसे त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम- गृहीतोऽसि नभस्याय त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों वर्षा के महीने हैं। इनमें वर्षा बहुत होती है। 'नभ' और 'नभस्य' ये दो वर्षा ऋतु के महीने हुए ॥१६॥ "उपयामगृहीतोऽसि इषे त्वा" (यजु० ७।३०)- इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम- गृहीतोऽस्यूर्जे त्वा" (यजु० ७।३०) - इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों शरद् ऋतु के महीने हैं क्योंकि शरद् ऋतुओं में अन्न और रस पकता है, इसलिए शरद् के इन महीनों का नाम इष और ऊर्ज है ॥१७॥