भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ११-१८ शतपथब्राह्मण / २८६ पावें। इसलिए भी 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, मरुतों के लिए नहीं ॥११॥ दो ऋतु-पात्रों से निकालता है। ऋतु संवत्सर यज्ञ है। प्रातःसवन में तो प्रत्यक्ष ही लिये जाते हैं, जब ऋतु-ग्रह निकाले जाते हैं। परन्तु दोपहर के सवन में परोक्ष रूप से निकलता है जब दो मरुत्वतीय ऋतुपात्रों को निकालता है, इसलिए दो मरुत्वतीय ऋतु-पात्रों में निकालता है ॥१२॥ वह इस मन्त्र से निकालता है—"इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः सुतस्य । तव प्रणीती तव शूर शर्मन्नाविवासन्ति कवयः सुयज्ञाः । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते” (यजु० ७।३५, ऋ० ३।५१।७)—"हे मरुतों से युक्त इन्द्र ! यहाँ सोम को पी, जैसे शार्यात के सोम को पिया था। सुयज्ञ कवि लोग तेरी प्रसन्नता और तेरी शरण की सहायता से ही यज्ञ में तेरी सेवा करते हैं। तुझे आश्रय के लिए लिया है। इन्द्र मरुत्-युक्त के लिए तुझको ! यह तेरी योनि है। मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए तुझको” ॥१३॥ दूसरे ग्रह को इस मन्त्र से निकालता है—"मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यँ शासमिन्द्रम् । विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रँ सहोदामिह तँ हुवेम । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते" (यजु० ७।३६, ऋ० ३।४७।५)—"मरुतवाले, बलवान्, वृद्धि-शील, दोष-रहित, दिव्य, शासक, सबके पालक इन्द्र को हम इस यज्ञ में नई रक्षा के लिए बुलाते हैं। आश्रय के लिए तुझे लिया जाता है। इन्द्र-मरुतवाले के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। इन्द्र मरुतवाले के लिए तुझको।' इस मन्त्र से तीसरा ग्रह निकालता है- "उपयाम- गृहीतोसि मरुतां त्वौजसे” (यजु० ७।३६)—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया है। मरुतों के ओज के लिए तुझको” ॥१४॥ अब वह माहेन्द्र ग्रह को लेता है। जैसे विजय की कामना के लिए वैश्यों के साथ एक ही पात्र में खा लेवे, इसी प्रकार इन्द्र भी वैश्य मरुतों के साथ मिलकर पाप-युक्त हो गया, क्योंकि मरुतों के साथ-साथ इन्द्र के लिए भी एक ही ग्रह निकाला गया ॥१५॥ तब देवों ने जीत हो जाने और अभय और शान्ति प्राप्त हो जाने पर इन्द्र को उस पाप से मुक्त किया जैसे सिरकी से मूंज निकाल लेते हैं, इस माहेन्द्र ग्रह को लेकर। जैसे सिरकी बिना मूंज के (साफ) हो जाती है इसी प्रकार माहेन्द्र ग्रह को निकालकर वह सब दोषों से दूर हो जाता है ॥१६॥ माहेन्द्र ग्रह को इसलिए भी निकालता है, वृत्र के वध से पहले वह इन्द्र था। अब किसी बड़े विजयी राजा के समान, वृत्र को मारकर माहेन्द्र बन गया। इसलिए माहेन्द्र ग्रह को लेता है। वृत्र के वध के लिए उसको बड़ा बनाता है, इसलिए भी माहेन्द्र ग्रह को लेता है। शुक्र-पात्र से लेता है। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। शुक्र महान् है, इसलिए शुक्र-पात्र से निकालता है ॥१७॥ इस मन्त्र से निकालता है—"महाँ२ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः सहोभिः । अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् । उपयामगृहीतोऽसि महेन्द्राय