शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 611, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकॉ० ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ५६३ आहुतिमय यज्ञ है, यह यजमान का मानो एक नया आत्मा बनाया जाता है। यह इसका परलोक में आत्मा होता है। इस आत्मा को इन्हीं ऋत्विजों ने बनाया है। इसलिए यह दक्षिणा ऋत्विजों की ही होनी चाहिए, उनकी नहीं जो ऋत्विज न हों ॥५॥ गार्हपत्य के पास जाकर दक्षिणा की आहुति देता है। झालरदार कपड़े में सोने का टुकड़ा बाँधकर और उसे चमसे में रखकर आहुति देता है यह कहकर कि 'देवलोक में मेरा स्थान हो।' जो कोई यज्ञ करता है वह इसलिए करता है कि यह यज्ञ देवलोक को जाता है। और जो दक्षिणा देता है वह भी देवलोक को जाती है। और दक्षिणा से लगा हुआ यजमान भी जाता है ॥६॥ चार प्रकार की दक्षिणा होती है-सोना, गौ, कपड़ा और घोड़ा। यह उचित नहीं है कि घोड़े के पैर को चमसे में रख दे या गौ के पैर को। इसलिए झालरदार कपड़े में सोना बाँधकर रखता है और उसकी आहुति देता है ॥७॥ सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति देता है। सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति इसलिए देता है कि वह (पर) लोक अन्धकार से छिप गया है। वह ज्योति से अन्धकार को हटाकर स्वर्ग- लोक को जाता है ॥८॥ इस आहुति के मन्त्र ये हैं, “उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य्यं॒ स्वाहा" (यजु० ७।४१, ऋ० १।५०।१) - “ये प्रकाश की किरणें उस सूर्य्य जातवेद देव सूर्य्य तक ले जाती हैं, सर्वत्र विश्व को दिखाने के लिए।" इस गायत्री से। यह पृथिवी गायत्री है। यह पृथिवी प्रतिष्ठा है। इसी प्रतिष्ठा में वह प्रतिष्ठित होता है ॥६॥ दूसरी आहुति का मन्त्र यह है, “चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी ऽ अन्तरिक्षं॒ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा" (यजु० ७।४२)- "विचित्र (आश्चर्य-युक्त) देवों अर्थात् प्रकाशों का अनीक अर्थात् समूह उदय होता है। यह मित्र, वरुण और अग्नि की आंख है अर्थात् इसी से सब प्रकाश को लेते हैं। यह सूर्य द्यौ, पृथिवी और अन्तरिक्ष में फैल जाता है। यह जंगम और स्थावर जगत् का आत्मा है। यह त्रिष्टुभ् है। इसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त करता है ॥१०॥ अब अग्नीध्र में एक या दो आहुति देता है। अग्नीध्र में एक या दो आहुतियाँ इसलिए देता है कि अग्नि पशुओं पर राज करता है। ये पशु उसको चारों ओर से घेर लेते हैं। उस अग्नि को इस आहुति से प्रसन्न करता है। वह अग्नि इससे प्रसन्न होकर अनुमति देता है। अनुमति से वह (गाय की) दक्षिणा देता है ॥११॥ आहुति का मन्त्र यह है, "अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज् जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउक्तिं विधेम स्वाहा" (यजु० ७।४३, ऋ० १।१८६।१) - "हे अग्नि ! धन के लिए हमको ठीक मार्ग पर ले चल। हे देव, तू सब कर्मों को जानता है। हमको पाप से बचा कि हम तेरी बहुत-बहुत स्तुति कर सकें।" अब यदि युक्त (सजे हुए) या अयुक्त (बेसजे) घोड़े को देना चाहे तो एक और आहुति पढ़े, अन्यथा नहीं ॥१२॥ वह आहुति का मन्त्र यह है, "अयं नो ऽ अग्निव॑रिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्। अयं वाजान् जयतु वाजसातवयँ॒ शत्रून् जयतु जहृ॑षाणोः स्वाहा" (यजु० ७।४४)- "यह अग्नि होम को धन (वरिवः = धनं) दे। यह युद्धों का भेद न करते हुए आगे बढ़े। यह अन्नों को जीते। यह जोश में आकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे।" घोड़ा विजय प्राप्त करनेवाला है ॥१३॥ अब सोने को लेकर शाला में जाता है। वेदी के दक्षिण की ओर दक्षिण की गौएँ खड़ी