शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / ५६७ अत्रि था। उस समय सदस् में असुरों का अन्धकार छा गया। ऋषियों ने अत्रि से कहा, 'यहाँ लौट आओ और अन्धकार को निकाल दो।' उसने इस अन्धकार को भगा दिया। उन्होंने यह समझकर कि यह ज्योति है, इसने अन्धकार दूर कर दिया, उसके लिए चमकीली सोने की दक्षिणा दी। स्वर्ण ज्योति है। उस ऋषि ने अपने तेज और पराक्रम से अन्धकार को दूर कर दिया। यह भी इसी ज्योति से अन्धकार को दूर करता है। इसलिए यहाँ अत्रि को स्वर्ण देता है ॥२१॥ अब ब्रह्मा को (दक्षिणा देता है)। ब्रह्मा यज्ञ की दक्षिण की ओर से रक्षा करता है। इसके बाद उद्गाता को, फिर होता को, फिर दोनों अध्वर्युओं को जो हविर्धान में बैठे हों। फिर लौटकर प्रस्तोता को, फिर मैत्रावरुण को, फिर ब्राह्मणाच्छंसी को, फिर पोता को, फिर नेष्टा को, फिर अच्छावाक को, फिर उन्नेता को, फिर ग्रावस्तोता को, फिर सुब्रह्मण्य को और सबसे पीछे प्रतिहर्ता को दक्षिणा देता है। प्रतिहर्ता इसके लिए गौवों को पकड़े रहता है। वे भागकर जाने नहीं पातीं ॥२२॥ अब (अध्वर्यु मैत्रावरुण से) कहता है कि 'इन्द्र मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो।' जब पहले प्रजापति दक्षिणा दे रहा था तो इन्द्र ने सोचा कि यह तो सब दे डालेगा। हमारे लिए कुछ भी न छोड़ेगा। उसने 'इन्द्र-मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो' इस वचनरूपी वज्र को उठाया कि वह दान देना बन्द कर दे। उसने दान बन्द कर दिया। यहाँ यह भी 'इन्द्र-मरुत्वंत के लिए अनुवाक पढ़ो' यह वज्र उठाता है, दान देना बन्द करने के लिए। वह दान देना बन्द कर देता है ॥२३॥ चार तरह की दक्षिणा होती है। (१) सोना—यह आयु है। इससे वह अपने जीवन की रक्षा करता है। सोना आयु है। (प्रजापति ने) यह सोना अग्नि को दिया था जो अग्नीध् (अग्नि प्रज्वलित करनेवाले) का काम कर रही थी। इसीलिए यह भी अग्नीध् को सोना देता है ॥२४॥ अब (२) गौ—इससे प्राणी की रक्षा होती है। गौ प्राण है, अन्न गौ है, अन्न प्राण है। इसको रुद्र या होता को देता है ॥२५॥ अब (३) कपड़ा—इससे अपनी खाल की रक्षा करता है। कपड़ा खाल है। उसको गाने- वाले बृहस्पति को देता है ॥२६॥ अब (४) घोड़ा—घोड़ा वज्र है, वज्र को वह इस प्रकार अपना अगुआ बनाता है। जो यज्ञ करता है वह इस आशा से करता है कि यमलोक में मुझे स्थान मिलेगा। इस प्रकार वह इसको यमलोक का हिस्सेदार कर देता है। इस (घोड़े) को वह यम या ब्रह्मा को देता है ॥२७॥ अध्वर्यु सोने को इस मन्त्र से लेता है, "अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) – "वरुण तुझे अग्नि के लिए मेरे लिए देवे।" वरुण ने अग्नि को ही तो दिया था। "सोऽमृतत्त्व- मशीयायुर्दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७) — "मैं अमृतत्व को प्राप्त करूँ।" दाता के लिए आयु दे। मुझे लेनेवाले के लिए सुख दे" ॥२८॥ अब गाय को इस मन्त्र से लेता है, "रुद्राय त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) – "वरुण तुझे रुद्र के लिए मुझे दे।" इसको वरुण ने रुद्र के लिए दिया था। "सोऽमृतत्त्वमशीय प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७)— "मुझे अमृतत्व मिले। दाता को प्राण