शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 617, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ३, ब्रा० ४-५, कं० २६-३३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६६ मिलें। मुझ लेनेवाले को वय अर्थात् आयु मिले" ॥२६॥ अब कपड़ा यह पढ़कर लेता है, “बृहस्पतये त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) — “वरुण तुझे बृहस्पति के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसे बृहस्पति को ही तो दिया था। “सोऽमृतत्त्व- मstate: मशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमृतत्व को पाऊँ, दाता को त्वचा मिले । मुझ लेनेवाले को सुख" ॥३०॥ अब घोड़े को यह पढ़कर लेता है, “यमाय त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) — “वरुण तुझे यम के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसको यम को दिया था। “सोऽमृतत्त्वमशीय हयो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमरत्तत्त्व को पाऊँ, घोड़ा दाता के लिए। आयु मुझ लेनेवाले के लिए" ॥३१॥ अब और जो कुछ देता है इस कामना से देता है कि जो मैं यहाँ दूँ वह मुझको उस लोक में मिले। उसको इस मन्त्र से लेता है, “कोऽदात् कस्मा ऽ अदात् कामोऽदात् कामायादात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्त्वे” (यजु० ७।४८)—'किसने दिया, किसको दिया, कामना ने दिया, कामना को दिया। कामना ही देनेवाली, कामना ही लेनेवाली । हे कामना ! यह सब तुझको।' इस प्रकार वह इसको एक देवता के लिए निश्चित कर देता है ॥३२॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि किसी देवता को अतिदेश न करे। जिस-जिस देवता को प्रज्वलित करता है वह देवता प्रकाशित होता और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। जिस अग्नि में ईंधन डाला जाता है वह प्रकाशित होती है और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। जो इस रहस्य को समझकर (दक्षिणा) लेता है उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। जैसे जलती हुई अग्नि में ही आहुति डालते हैं उसी प्रकार पढ़े हुए को ही दान देता है। इसलिए विद्वान् को चाहिए कि किसी देवता को अतिदेश न करे ॥३३॥ आदित्यग्रहः अध्याय ३- ब्राह्मण ५ देव तीन प्रकार के हैं— वसु, रुद्र, आदित्य । सवन इन्हीं में बँटे हुए हैं। प्रातःसवन केवल वसुओं का है, दोपहर का रुद्रों का और तीसरा सवन आदित्यों का। प्रातःसवन वसुओं का, बिना साझे का है। दोपहर का सवन रुद्रों का, बिना साझे का है। लेकिन तीसरे सवन में आदित्यों के साथ दूसरों का भी साझा है ॥१॥ आदित्यों ने कहा, 'चूंकि प्रातःसवन में वसुओं के साथ किसी का साझा नहीं, दोपहर में रुद्र के साथ किसी का साझा नहीं, इसलिए इस प्रकार हमारे लिए भी एक ग्रह की आहुति दो, पूर्व इसके कि सबका मिश्रित सवन हो।' देवों ने कहा 'अच्छा।' दोपहर की समाप्ति पर तीसरे सवन से पहले-पहले उन्होंने आहुति दे दी। इसी प्रकार अब तक भी इस ग्रह की आहुति दी जाती है। दोपहर के सवन की समाप्ति पर और तीसरे सवन के पहले-पहले ॥२॥ आदित्य बोले, 'हम न तो पहले सवन में साझी हैं, न दूसरे में। ऐसा न हो कि राक्षस हमको हानि पहुँचावें' ॥३॥ उन्होंने द्विदेवत्य अर्थात् उन ग्रहों से जिनमें दो देवताओं का साझा है, कहा, 'हम राक्षसों से डरते हैं। ऐसा करो कि हम तुममें घुस बैठें' ॥४॥ उन द्विदेवत्य ग्रहों ने उत्तर दिया, 'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' आदित्यों ने कहा कि 'हमारे साथ अनुवषट्कार में तुम्हारा भी साझा होगा।' उन्होंने कहा 'अच्छा' और वे द्विदेवत्य ग्रहों में घुस बैठे ॥५॥