भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० ३, ब्रा० ५, क० १३-२३ शतपथब्राह्मण / ६०३ दही इसलिए लेता है कि यह जो बचा-खुचा सोमरस होता है वह आहुतियों के लिए काफी नहीं होता। उसको दही से बढ़ा लेता है और यह दही के लिए काफी हो जाता है। इसलिए दही मिलाता है ॥१४॥ वह इस मन्त्र से लेता है, "यज्ञो देवानां प्रत्येति सुन्ममादित्यासो भवता मृडयन्तः। आ वोऽर्वाची सुमतिर्ववृत्याद॒होश्चिद्या वरिवोवित्तरासदात्। आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।४; ऋ० १।१०७।१)-"यज्ञ देवों के साथ सुख के लिए आता है। हे आदित्यो ! कृपा करो। आपकी सुमति हमारे समक्ष हो।" यज्ञ देवों के सुख का सम्पादन करता है। हे आदित्यो ! आप हमको सुख देनेवाले हों। आपकी अच्छी मति (सुमति) हमारे समक्ष आवे (अर्थात् हम सुमतिवाले हों)। जो मति दरिद्रतायुक्त मनुष्य को भी अत्यन्त धन देनेवाली है वह भी हमारे समक्ष आवे। हे ग्रह, तुझको आदित्य के लिए" ॥१५॥ उपांशु सवन पत्थर से पीसकर उसको मिलाता है। यह जो उपांशु सवन है वह तो वास्तव में आदित्य विवस्वान् (सूर्य) ही है और यह आदित्य का ग्रह है। इस प्रकार इसको इसी के भाग से प्रसन्न करता है ॥१६॥ इसको न झालर से और न पवित्रे से छूता है। ये जो प्रातःसवन और दोपहर के सवन हैं ये दोनों शुक्रवाले और रसवाले हैं। परन्तु यह जो तीसरा सवन है वह सोम से शून्य है (सोम इसमें से निकल चुका है)। झालर या पवित्रे से न छूने से यह शुक्रवाला और रसवाला हो जाता है। इसलिए वह न झालर से और न पवित्रे से छूता है ॥१७॥ वह इस मन्त्र से मिलाता है, "विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन् मत्स्व" (यजु० ८।५)-"हे प्रतापी आदित्य ! आ ! यह तेरा सोम-भाग है। इससे तृप्त हो।" अब उपांशु सवन को उन्नेता को दे देता है। फिर उन्नेता से कहता है, 'ग्रावा (पत्थर) को डाल दे।' उसको आधवनीय या चमसे में डाल देता है ॥१८॥ सोम राजा को निकालकर-तीसरा सवन आदित्यों का है। ये पत्थर भी आदित्य ही हैं। इस प्रकार इनको इन्हीं के भाग से प्रसन्न करता है। अब दरवाजे को खोल देते हैं ॥१९॥ उस ग्रह को ढककर बाहर निकल आता है, क्योंकि आदित्यों को राक्षसों से भय था। अब वह कहता है कि आदित्यों के लिए अनुवाक कहो। यदि चाहे तो (उनके गुणों को) गिना दे। श्रौषट् कहकर गिनावे, इस प्रकार-'प्रिय, प्रियधाम, प्रियव्रत, महान् घर के पति, बड़े अन्तरिक्ष के अधिपति, आदित्यों के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करके आहुति देता है। अनु- वषट्कार नहीं किया जाता कि कहीं पशुओं को अग्नि के समर्पण न कर दे। बचा-खुचा प्रति- प्रस्थाता को दे देता है ॥२०॥ अब वह फिर (हविर्धान में) आकर आग्रयण को लेता है। उत्तर की ओर झालर और पवित्रे को फैला देते हैं। अध्वर्यु आग्रयण में से (रस) उंडेलता है। प्रतिप्रस्थाता बचे-खुचे दोनों भागों को पकड़ता है। उन्नेता (आधवनीय में से) कुछ रस मिलाता है, चमसे या उदंचन से ॥२१॥ इस प्रकार आग्रयण को चार धाराओं में लेता है। तीसरा सवन आदित्यों का है। गायें आदित्यों के पीछे हैं। इसीलिए गायों का दूध चार प्रकार का होता है। इसलिए आग्रयण को चार धाराओं में लेता है ॥२२॥ प्रतिप्रस्थाता उन बचे-खुचे दोनों भागों को इसलिए पकड़ता है कि बचा-खुचा आदित्य