भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ४, अ० ४, ब्रा० १-२, कं० १५-१८ व १-४ शतपथब्राह्मण / ६०६ च नियुद्भिर्वायविह ता विमुंचः।”—“एक और दस (ग्यारह) से अपने लिए, दो और बीस (बाईस) से इष्टि के लिए, तीन और तीस (तैंतीस) से देवों के लिए। हे वायु, तू अपने घोड़ों की जोड़ी के द्वारा इनको छोड़।” जब होता इस वायुवाली ऋचा को पढ़ता है तो पात्र छूट जाते हैं (जैसे घोड़े हल या रथ से छोड़ दिये जाते हैं उसी प्रकार)। पशु वायु के ही अनुचर हैं (वायु ही उनका अगुआ है)। वायु प्राण है। प्राण से ही पशु चलते हैं ॥१५॥ एक बार (प्राण) देवों से निकलकर पशुओं के साथ चला गया। देवों ने उसे प्रातः- सवन में बुलाया, वह नहीं आया। दोपहर के सवन में बुलाया, वह नहीं आया। तीसरे सवन में बुलाया, तब—॥१६॥ लौटने की इच्छा करके उसने कहा, 'यदि लौट आऊँ तो मुझे क्या मिलेगा?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'तेरे ही द्वारा ये पात्र नियुक्त हो सकेंगे और तेरे ही द्वारा खुल सकेंगे।' इसलिए ये पात्र (वायु के) द्वारा ही नियुक्त होते हैं जब प्रातःसवन में इन्द्र, वायु आदि के लिए ग्रहों को निकालते हैं। और जब कहा कि 'हे वायु, तू अपनी जोड़ियों को खोल दे' तो इसी (वायु) के द्वारा वे खुलते हैं। जोड़ी का अर्थ है पशु। इस प्रकार पशुओं द्वारा ये पात्र खोले जाते हैं ॥१७॥ अगर वह प्रातःसवन में ही लौट आया होता—प्रातःसवन गायत्री का है और गायत्री ब्राह्मण है-तो पशु केवल ब्राह्मण के ही हो जाते। यदि वह दोपहर के सवन में लौट आया होता- दोपहर का सवन इन्द्र का है, इन्द्र क्षत्रिय है-तो पशु केवल क्षत्रिय के ही हो जाते। परन्तु चूंकि वह तीसरे सवन में लौटा-तीसरा सवन विश्वेदेवों का है और विश्वेदेव का अर्थ है 'सब-कुछ', इसलिए पशु भी सर्वत्र ही होते हैं ॥१८॥ सौम्यश्चरुः, पात्नीवतग्रहश्च अध्याय ४-ब्राह्मण २ अब सोम के चरु का कृत्य आरम्भ हुआ। सोम देवों की हवि है। अब यह सोम के लिए हवि बनाई जाती है। इस प्रकार सोम इससे अलग नहीं होता। यह चरु होता है क्योंकि चरुदेवों का अन्न है। चरु भात है। भात तो प्रत्यक्ष में अन्न है। इसलिए चरु बनाया जाता है ॥१॥ यह (चरु.को) न तो प्रातःसवन में बनाते हैं, न दोपहर के सवन में, क्योंकि प्रातःसवन और दोपहर का सवन केवल देवों के ही हैं। सोम पितरों का है ॥२॥ यदि (चरु) प्रातःसवन में बनाता या दोपहर के सवन में, तो देवों और पितरों में झगड़ा हो जाता। वह इसको तीसरे सवन में बनाता है क्योंकि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। इस प्रकार वह झगड़ा नहीं होने देता। अनुवाक नहीं पड़ता, क्योंकि पितर तो एक बार ही चले गये। इसलिए अनुवाक नहीं पढ़ता ॥३॥ पहले चार पात्रों में घी लेकर और (आग्नीध्र से) श्रौषट् कहलवाकर आदेश देता है कि 'घी की आहुति दे' और वषट्कार करके आहुति देता है। अब तक जितनी आहुतियां दी जा चुकीं

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