शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 637, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१० शतपथब्राह्मण / ६१६ के लिए यज्ञ रचाते हैं वे सब समिष्ट (चाहे हुए) हो जाते हैं। उन सब समिष्टियों में इनकी आहुति दी जाती है इसलिए इनको समिष्ट-यजु कहते हैं ॥३॥ समिष्ट यजुओं की आहुति इसलिए दी जाती है कि यज्ञ करनेवाले का आत्मा तो खाली हो जाता है, क्योंकि जो कुछ उसका होता है उसको वह दे चुकता है, इनमें से तीन आहुतियों से उसी की पूर्ति की जाती है ॥४॥ और जो अन्य तीन आहुतियां दी जाती हैं, इस यज्ञ से जिस देवता को बुलाता है, या जिन देवताओं के लिए यज्ञ रचता है, वे सब देवता प्रतीक्षा करते रहते हैं जब तक कि समिष्ट- यजुओं की आहुति नहीं पड़ती कि यह हमारे लिए आहुतियां देगा। इन्हीं देवताओं का वह यथाविधि विसर्जन कर देता है। जहां-जहां वे जाना चाहें क्रम से ॥५॥ और जो तीन अन्तिम आहुतियां हैं, उनसे यज्ञ की उत्पत्ति की, और उत्पत्ति करके उसने यहां उसकी प्रतिष्ठा की। चूंकि वह उसकी प्रतिष्ठा करता है इसलिए वह समिष्ट-यजुओं से आहुति देता है ॥६॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है—‘‘समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः’’ (यजु० ८।१५, ऋ० ५।४२।४)—‘‘हे इन्द्र, तू हमको मन से और गौओं से प्राप्त होता है।’’ जो मन (विचार) से खाली था उसको मन से और जो गौओं से खाली था उसको गौओं से भरता है। ‘‘स॒ँ सूरि- भिर्मघवन्त्सं स्वस्त्या। सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति’’ (यजु०८।१५)—‘‘हे इन्द्र, विद्वानों से, कल्याण से और देवकृत-स्तुति।’’ जो स्तुति से खाली था उसकी स्तुति द्वारा पूर्ति करता है। ‘‘सं देवानाँ सुमती यज्ञियानाँ स्वाहा’’ (यजु० ८।१५)—‘‘यज्ञ करनेवाले देवों की सुमति से’’ ॥७॥ ‘‘सं वर्चसा पयसा सं तनूभिः’’ (यजु० ८।१६)—‘‘तेज से खाली को तेज से, रस से खाली को रस से भरता है क्योंकि ‘पय’ नाम है रस का।’’ ‘‘अग्न्महि मनसा संशिवेन। त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्’’ (यजु० ८।१६)—‘‘(यह वही है जो ८।१४ है। इसका अर्थ ऊपर आ चुका) उस प्रकार जो व्रण था उसको चंगा करता है ॥८॥ तीसरी आहुति इस मन्त्र से—‘‘धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो- ऽअग्निः। त्वष्टा विष्णुः प्रजया सँ रराणो यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा’’ (यजु० ८।१७, अथर्व ७।१७।४)—‘‘कृपालु धाता, सविता, कोष की रक्षा करनेवाला प्रजापति, अग्निदेव इस आहुति को लेवे। त्वष्टा विष्णु यजमान के लिए धन और सन्तान दे।’’ ‘यजमान को धन दे’ ऐसा कहने से प्रयोजन यह है कि यह जो खाली हो गया था उसको भरता है ॥६॥ चौथी आहुति इससे—‘‘सुगा वो देवाः सदना ऽअकर्म य ऽआजग्मेदँ॒ सवनं जुषाणाः’’ (यजु० ८।१८)—‘‘अर्थात् हे देवो ! जो इस सोम-भाग में आये हुए हो, तुम्हारे लिए हमने ऐसे घर बनाये हुए हैं जिनमें तुम सुगमता से जा सको।’’ ‘‘भरमाणा वहमाना हवीँषि’’ (यजु० ८।१८)—‘‘हवियों को ढोते हुए या गाड़ियों में ले-जाते हुए।’’ ऐसा कहकर वह कतिपय देवों का विसर्जन करता है। जिनके पास सवारियां नहीं हैं वे स्वयं हवियों को ढोते हैं और जिनके पास सवारियां हैं वे सवारी में ले जाते हैं। इसलिए कहा ‘भरमाणा’ अर्थात् ढोते हुए और