शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ४, ब्रा० ४-५, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / ६२१ 'वहमाना' अर्थात् गाड़ियों में ले-जाते हुए । "अस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा" (यजु० ८।१६)- "हे वसुओ, हमारे लिए धन दो" ॥१०॥ पाँचवीं इस मन्त्र से—"यां२ ऽ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे ऽ अग्ने सधस्थे" (यजु० ८।१६)--- "हे देव, जिन इच्छुक देवों को तुम यहाँ लाये हो, हे अग्नि, तुम उनको अपने- अपने घर पहुँचा दो।" पहले तो अग्नि से कहा था कि इन देवों को लाओ, इन देवों को लाओ। अब अग्नि से कहता है कि जिन-जिन देवों को तुम लाये हो उन उनको अपने-अपने घर पहुँचा दो। "जक्षिवाꣳसः पपिवाꣳसश्च विश्वे" (यजु० ८।१६)- "तुम सबने खा भी लिया और पी भी लिया।" अर्थात् पशु पुरोडाश को खा लिया और सोम राजा को पी लिया। "असुं घर्मँ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा" (यजु० ८।१६)- "प्राण या वायु को, घर्म या आदित्य लोक को, स्व अर्थात् द्यौलोक को जाओ" ऐसा कहकर उन देवों को विदा करता है ॥११॥ इससे छठी — "वयँ हि त्वा प्रयति यज्ञे ऽ अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह । ऋधगया- ऽऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्त्स्वाहा" (यजु० ८।२०)- "हे अग्नि, इस यज्ञ से आरम्भ में हमने तुमको होता बनाया है। तू समृद्धि के साथ आया और तूने समृद्धि के साथ शयन किया। तू अपने अधिकार को जानते हुए यज्ञ में आ।" इससे वह अग्नि को छोड़ देता है, उसका विसर्जन कर देता है ॥१२॥ सातवीं इस मन्त्र से—"देवा गातुविदः" (यजु० ८।२१)- "मार्ग जाननेवाले देवो।" क्योंकि देव मार्ग को जानते हैं। "गातुं वित्त्वा" (यजु० ८।२१)- "मार्ग अर्थात् यज्ञ को मालूम करके।" "गातुमित" (यजु० ८।२१) —"जाइये।" इससे वह उनको उचित रीति से विदा कर देता है। "मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः" (८।२१)- "हे मन के पति देव, इस यज्ञ को वायु में रख।" यह जो वायु है वही यज्ञ है। यज्ञ को समाप्त करके वह इसको इस प्रकार यज्ञ में ही स्थापित करता है। यज्ञ को यज्ञ से मिला देता है, इसलिए कहता है यज्ञ को वायु में रख ॥१३॥ आठवीं इस मन्त्र से—"यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपति गच्छ स्वां योनि गच्छ स्वाहा" (यजु० ८।२२)- "हे यज्ञ, यज्ञ को प्राप्त हो, यज्ञपति को प्राप्त हो, अपनी योनि को प्राप्त हो।" जब यज्ञ प्रतिष्ठित हो गया तो फिर उसको उसी की योनि में प्रतिष्ठित करता है।" एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा" (यजु० ८।२२)- "हे यज्ञपति, यह तेरा यज्ञ है, स्तोत्रों सहित, सब वीरों से युक्त; इसको स्वीकार कर।" इस स्तोत तथा वीरयुक्त यज्ञ को यजमान में स्थापित करता है ॥१४॥ अध्याय ४-ब्राह्मण ५ अब अवभृथ स्नान के लिए जाता है। अवभृथ स्नान के लिए इसलिए जाता है कि जो इस (सोम) का रस था, वह इसकी आहुतियों के लिए उत्पन्न हुआ था। रहा उस (सोम) का शरीर, उसमें तो रस नहीं है। उसे फेंकना तो चाहिए नहीं। अब उसको जलों के पास ले जाता है। इस प्रकार वह उसको रस से युक्त करता है और उस (सोम) को रस में से ही उत्पन्न करता है। इस प्रकार उत्पन्न हुआ सोम यजमान को उत्पन्न करता है। चूंकि सोम को जलों के पास ले जाते हैं (अभि-अव-हरन्ति) इसलिए इसका नाम अवभृथ है ॥१॥ इसके पश्चात् समिष्ट-यजुओँ की आहुति देता है। समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है। समिष्ट-यजुओँ की आहुतियाँ देने के पश्चात् जो कुछ उसके पास होता है उसको लेकर चात्वाल