शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० ३-१० शतपथब्राह्मण / ६३३ चाहें जाँघें चीरना ही क्यों न पड़ें इस गर्भ को निकाल ले ॥३॥ जब वह (गर्भ) निकल आवे तो इस मन्त्र को पढ़े, "एजतु दशमास्यो गर्भः" (यजु० ८।२८)—"जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"दश मास का गर्भ जरायु के साथ स्पन्दन करे।" 'स्पन्दन करे' यह कहकर कि वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है। दश मास का इसलिए कहा कि दश मास में गर्भ पूर्णतया बढ़ पाता है। यहाँ यह दस मास का नहीं भी हो तो भी यजु० के मन्त्र पढ़कर वह उसे दस मास का कर देता है ॥४॥ 'जरायुणा सह' (यजु० ८।२८)—दस मास का बच्चा जरायु के साथ निकलता है। इसी प्रकार यह भी निकले। "यथायं वायुरेर्जति यथा समुद्र ऽ एजति" (यजु० ८।२८)—"जैसे यह वायु चलता है या जैसे यह समुद्र चलता है।" इससे वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है(?)। "एवायँ दशमास्यो ऽ अस्रज्जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"इसी प्रकार यह दश मास का जरायु के साथ बाहर निकल आया।" अर्थात्—जैसे दश मास का गर्भ जरायु के साथ निकलता है उसी प्रकार यह भी निकले ॥५॥ अब कुछ लोग पूछते हैं कि इस गर्भ का करना क्या चाहिए ? क्या इसके अंग-अंग काट डालने चाहिएँ, जैसे अन्योँ के टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं ? नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए। इसके अंग तो अभी बन नहीं पाये। गर्दन के नीचे काटकर उसका मेध थाली में टपका देवे। यह मेध सभी अंगों से टपकता है, इसलिए सभी अंगों का भाग समझा जाता है। अब वह वशा (गाय) के इसी प्रकार भाग करते हैं जैसे किये जाते हैं ॥६॥ पशुश्रपण (पशु को पकाने की अग्नि) पर उन भागों को पकाते हैं। वहीं उस मेध को भी पकाते हैं। गर्भ को अँगोछे में चारों ओर लपेटकर पशुश्रपण के पास रख देते हैं। जब पक जाता है तो उन भागों को इकट्ठा करके आहुति देते हैं (अभिजुहोति), परन्तु मेध की नहीं। अब वे पशु को निकालते हैं और मेध को भी ॥७॥ इसको चात्वाल के पीछे अग्नि और यूप के बीच में होकर ले जाते हैं। दक्षिण की ओर रखकर प्रतिप्रस्थाता (यज्ञ के भागों को) काटता है। अब दोनों स्रुचों में घी लगाता है और (होता से) कहता है कि मनोता के लिए हवि के अवसर पर अनुवाक पढ़। अब वे वशा (गाय) के टुकड़े-टुकड़े करते हैं, उसी प्रकार जैसे करने चाहिएँ ॥८॥ प्रचरणी नाम की एक स्रुक् होती है। उसमें प्रतिप्रस्थाता मेध की एक तह लगा देता है। दो भाग काटता है। एक बार घी डालता है और उन दोनों भागों को पूरा करता है। अब अनु- वाक के लिए कहता है, और श्रौषट् कहलवाकर (मैत्रावरुण से) कहता है कि अनुवाक कहलवा। वषट्कार के बाद अध्वर्यु आहुति देता है। अध्वर्यु के होम के पीछे प्रतिप्रस्थाता आहुति देता है, इस मंत्र से—॥६॥ "यस्यै ते यज्ञियो गर्भः" (यजु० ८।२६)—"तू जिसका गर्भ यज्ञ के योग्य हो गया है।" गर्भ यज्ञ के योग्य नहीं था। इसको वह मंत्र पढ़कर यज्ञ के योग्य बनाता है। "यस्यै योनिर्हिरण्ययी" (यजु० ८।२६)—"जिसकी सोने की योनि है।" पहले योनि को फाड़ा था जब उसमें से गर्भ निकाला था। सोना अमर-आयु है। इस प्रकार वह इसकी योनि को अमर बना देता हैं। "अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजीगम ँ स्वाहा" (यजु० ८/२६)—"जिसके अंग टूटे नहीं हैं उसको मैंने माता के साथ जोड़ा है।" यदि गर्भ नर हो तो ऐसा कहे और यदि गर्भ मादा हो तो