भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 683

कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६-७, कं० ३-८ व १-२ शतपथब्राह्मण / ६६५ और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥३॥ उन्होंने इन्द्र से कहा—'तू हममें सबसे प्रबल है, तू दक्षिण की ओर बैठ जिससे हम अभय और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥४॥ उसने उत्तर दिया—'तो मुझे क्या मिलेगा ?' उन्होंने कहा कि 'ब्राह्मणाच्छंसी का पद तेरा होगा, ब्रह्मसाम तेरा होगा।' इसलिए ब्राह्मणाच्छंसी का वरण करते हैं तो कहते हैं कि 'इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणात्' अर्थात् 'इन्द्र ब्राह्मण होने के कारण ब्रह्मा है।' यह पदवी इन्द्र की है। इन्द्र दक्षिण की ओर बैठा और वे अभय तथा निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करने लगे। इसलिए जो सबसे बलिष्ठ हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त स्थान में उनको यज्ञ करना चाहिए। ब्राह्मणों में जो सबसे अधिक वेद पढ़ा है वही सबसे प्रबल है। अब जो कोई ब्रह्मा हो जाता है वह क्या चुपचाप नहीं बैठता ? इसलिए जो कोई सबसे प्रबल हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और औरों को उत्तर की ओर अभय तथा निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करना चाहिए। इसलिए ब्राह्मण वेदी के दक्षिण भाग में बैठते हैं और दूसरे लोग उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करते हैं ॥५॥ जब प्रस्तोता कहता है कि 'हे ब्रह्मन् प्रशास्ता, हम स्तुति करेंगे।' तब ब्रह्मा जपता है, “एतं ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे । तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव” (यजु० २।१२)—“हे देव सविता ! तेरे इस यज्ञ को ब्रह्म बृहस्पति के लिए विज्ञप्त किया है। इसलिए यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की रक्षा कर, मेरी रक्षा कर।” सविता की प्रेरणा से स्तुति करो। इसका भी वही फल है। वे अधिकतर स्तुति इसी मन्त्र से करते हैं ॥६॥ ऐसा कहकर भी स्तुति हो सकती है कि 'हे देव सविता' यह, 'हे बृहस्पति, आगे बढ़िए ।' इससे वह प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है। वही देवों का प्रेरक है। बृहस्पति, बढ़ो' वह इसलिए कहता है कि बृहस्पति देवों का ब्रह्मा है। इस प्रकार जो देवों का ब्रह्मा है उसकी घोषणा करता है। इसलिए कहता है कि 'बृहस्पति, बढ़ो' ॥७॥ अब मैत्रावरुण जपता है, 'देव सविता से प्रेरित होकर मित्र और वरुण के लिए प्रिय हो ।' इस प्रकार प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है क्योंकि वह देवों का प्रेरक है। 'मित्र और वरुण के लिए प्रिय' इसलिए कि मैत्रावरुण के दो देवता हैं—मित्र और वरुण । इस प्रकार मैत्रावरुण के जो दो देवता हैं उनके प्रति घोषणा करता है। इसलिए कहता है 'मित्र और वरुण के लिए' ॥८॥ ब्रह्मत्व-सदो-हविर्धान-विधिशेषः अध्याय ६-ब्राह्मण ७ विद्या के तीन भाग हैं—ऋक्, यजुः और साम। यह पृथिवी ऋक् है क्योंकि जो कोई ऋक् पढ़ता है यही पढ़ता है। वाणी ऋक् है क्योंकि जो कोई पढ़ता है वाणी से पढ़ता है। अन्तरिक्ष यजुः है और द्यौ साम है। सोम यज्ञ में इस तीनों भाग वाली विद्या का प्रयोग होता है ॥१॥ इस लोक को ऋक् से जीतता है, अन्तरिक्ष को यजुः से और द्यौ को साम से । इसलिए