शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ६, ब्रा० ८, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६७३ ये इन्हीं लकड़ियों से वध करते हैं। यह रीति है ॥७॥ दूसरी यह है—अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ जाते हैं जहाँ प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करना है। आग मथकर उस पर समिधा रखके उसमें से आहवनीय को लेकर प्रजापति- सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥८॥ उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों पर अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और वहाँ (दैनिक) आहुतियाँ देते हैं ॥६॥ यदि दीक्षा उसी दिन लेनी हो तो अरणियों पर अग्नियों को लेकर वहाँ चले आते हैं जहाँ दीक्षा लेनी है। पहले गृहपति ही मथता है, फिर और उसके पास बैठकर मथते हैं। और जो-जो अपनी आग मथता है वह उसको गृहपति के ही गार्हपत्य में डाल देता है। गृहपति के ही गार्हपत्य से आहवनीय लेकर दीक्षा लेते हैं, उनकी आहवनीय एक ही होतो है और एक ही गार्हपत्य दीक्षा में भी और उपसदों में भी ॥१०॥ जिस दिन उनको सोम का क्रय करना हो (मोल लेना हो) उस दिन गार्हपत्य को चिनते हैं, और उपवास के दिन दूसरों के लिए धिष्ण्या। विसर्जन के समय पत्नियां आगे आती हैं और यजमान इस दूसरी अग्नि को छोड़ जाता है। और जब विसर्जन की आहुति दी जाती है—॥११॥ तभी सोम राजा को लाता है। आग्नीध्र अग्नि उस समय लाई हुई होती है। उसमें से एक-एक लकड़ी को लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में लाते हैं। जो इस प्रकार करते हैं वे झगड़ा करते हैं। झगड़ा उनके बीच में आ जाता है। वे झगड़ा कर बैठते हैं जो इस प्रकार यज्ञ करते हैं। यह दूसरी रीति है ॥१२॥ यह तीसरी रीति है—गृहपति की ही अरणियों में साझी हो जाते हैं। 'जो अग्नि इनसे उत्पन्न होगी इसमें हमारा भाग है। इस यज्ञ के करने से जो फल होगा, या पशु-बन्ध से, इसमें हमारा भाग है। जो पुण्य कर्म है उसमें हम सब शामिल हैं। जो पाप करे वह उसका अपना है।' ऐसा कहकर गृहपति पहले अपने लिए आग लेता है, फिर दूसरों के लिए, या वे स्वयं अपने लिए लेते हैं। वे उस स्थान पर आते हैं जहाँ प्रजापति का पशुयाग होना होता है। आग मथकर, समिधा रखकर आहवनीय को लेते हैं और प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥१३॥ उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उस दिन उनकी दीक्षा नहीं होनी होती तो अरणियों पर अग्नियों को लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और आहुतियां दे लेते हैं ॥१४॥ यदि इस दिन दीक्षा होनी होती है तो गृहपति की ही अरणियों में साझा कर लेते हैं कि 'जो अग्नि उत्पन्न होगी उसमें हमारा भाग है और जो इस होनेवाले यज्ञ तथा सत्र से फल होना है उसमें हमारा साझा है। जो-जो पुण्य करना है उसमें हमारा साझा है। जो पाप हो जाय वह