शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ६, ब्रा० ८-६, कं० १५-२० व १-२ शतपथब्राह्मण / ६७५ हर एक का अपना-अपना है।' ऐसा कहकर पहले गृहपति अरणियों पर अपने लिए मथता है, फिर दूसरों के लिए, या वे स्वयं अपने लिए मथ लेते हैं। अब वे वहाँ आते हैं जहाँ दीक्षा होनी होती है। मथकर, समिधा रखकर आहवनीय को लाते हैं और उसमें दीक्षा लेते हैं। दीक्षा और उपसद में इनकी एक ही आहवनीय होती है और एक ही गार्हपत्य ॥१५॥ अब जिस दिन सोम-क्रय करना हो उस दिन गार्हपत्य को चिनते हैं, और उपवास के दिन दूसरों के लिए धिष्ण्य । विसर्जन के समय पत्नियां आगे आती हैं। यजमान उस दूसरी अग्नि को छोड़ जाता है। विसर्जन की आहुति होने पर—॥१६॥ सोम राजा को लाता है। आग्नीध्र अग्नि लाई हुई होती है। उसमें से एक-एक लकड़ी लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में लाते हैं। इस प्रकार यह हो जाता है; अधूरा (अहृत) नहीं रहता। अलग-अलग धिष्ण्या इसलिए होती है कि बीच में आने-जाने के लिए अवकाश रहे। पुरोडाश अलग-अलग इसलिए होता है कि यज्ञ की समाप्ति के लिए अधिक हव्य बच रहे ॥१७॥ जिस सत्र से देवों ने शीघ्र ही पाप को मार डाला और वह विजय पा ली जो इस समय उनको प्राप्त है, उसकी व्याख्या हो चुकी। एक गृहपति, एक पुरोडाश, एक धिष्ण्या से उन्होंने पाप को शीघ्र ही भगा दिया और शीघ्र ही उत्पन्न हो गये। इसी प्रकार यह भी एक गृहपति, एक पुरोडाश और एक धिष्ण्या से पाप को शीघ्र ही भगा देते हैं और फिर उत्पन्न हो जाते हैं ॥१८॥ पहली दशा में एक शाला होती है जिसमें बाँस दक्षिण से उत्तर की ओर होते हैं। यह मानुषी विधि है। एक ही आहवनीय होती है और भिन्न-भिन्न गार्हपत्य । यह विकृष्टि अर्थात् भिन्नता है। गृहपति के ही गार्हपत्य में पशु के पिछले भाग से पत्नी संयाज आहुतियां देते हैं, और दूसरे बैठकर घी की आहुति देते हैं। यह विकृष्टि अर्थात् भिन्नता है ॥१९॥ परन्तु यहाँ ऐसी शाला होती है जिसमें पश्चिम से पूर्व की ओर बाँस होते हैं। यहाँ एक ही आहवनीय होती है और एक ही गार्हपत्य, एक आग्नीध्रीय । इस प्रकार यह सत्र सफल होता है जैसे एकाह (एक दिन का यज्ञ) सफल हुआ। इसमें कोई वैफल्य नहीं। धिष्ण्या को छोड़कर यहाँ हर बात में समानता है ॥२०॥ सत्रधर्माः अध्याय ६—ब्राह्मण ६ देव एक सत्र में बैठे इस इच्छा से कि श्री और यश मिले; अन्न को खानेवाले हो जायें । उनसे वह अन्न जो उन्होंने जीता था भाग गया। पशु अन्न हैं। पशु ही उनसे भाग गये, यह सोचकर कि ये देव थक गये हैं, कहीं हमको हानि न पहुँचावें, और न जाने हमारे साथ कैसा बर्ताव करें ॥१॥ उन्होंने गार्हपत्य में इन दो आहुतियों को दिया। गार्हपत्य गृह हैं। गृह प्रतिष्ठा हैं। इस