शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ३, ब्रा० ६, कं० १२-२६ शतपथब्राह्मण / ६७६ मिल जाती है। ये अमर हो जाते हैं। “दिवं॑ पृथि॒व्या ऽअध्यारु॑हाम” (यजु० ८।५२)—“हम पृथिवी से द्यौलोक में पहुँच गये।” जो सत्र में बैठते हैं वे पृथिवी से द्यौलोक में पहुँच जाते हैं। “विदाम॑ दे॒वान्” (यजु० ८।५२)—“हमने देवों को प्राप्त किया।” क्योंकि वे वस्तुतः देवों को पा जाते हैं। “स्व॒र्ज्योति॑:” (यजु० ८।५२)—“स्वर्ग को और ज्योति को।” इसको तीन बार कहते हैं। यही स्वर्ग और ज्योति के भागी हो जाते हैं। इस प्रकार जो सत्र में बैठते हैं उनका वही रूप हो जाता है जो साम का रूप है ॥१२॥ वे दक्षिणी हविर्धान के धुरे के नीचे रेंगते हैं। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुल छोड़ देता है उसी प्रकार ये अपने पापों से मुक्त हो जाते हैं। अतिछन्दस् से रेंगते हैं। ये जो अतिछन्दस् हैं वे ही सब छन्द हैं। इस प्रकार पाप उनको नहीं लगता। इसलिए वे अतिछन्दस् से रेंगते हैं ॥१३॥ वे इस मन्त्र को पढ़कर रेंगते हैं— “यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा यो नः॒ पृत॒न्यादप॒ तं- तम॑िद्धतं॒ वज्रे॑ण॒ तन्त॑मिद्धतम्। दू॒रे च॒त्ताय॑ छन्तस॒द् गहनं॒ यदिनक्ष॑त्। अ॒स्माकँ॑ श॒त्रून् परि॑ शूर वि॒श्वतो॑ द॒र्मा द॑र्षीष्ट वि॒श्वतः॑’ (यजु० ८।५३)—“हे इन्द्र और पर्वत ! तुम दोनों उसको जो हमसे युद्ध में लड़ता है मारो। वज्र से उसको मारो। उसको भी जो दूर देश में जाकर छिप गया हो। हे शूर ! हमारे शत्रुओं को फाड़ डालनेवाला चारों ओर से फाड़ डाले—चारों ओर से” ॥१४॥ वे पूर्व की ओर निकलते हैं और सदस् में आगे से पीछे की ओर प्रवेश करते हैं। पीछे से आगे की ओर उस समय आये थे जब यज्ञ करना था। सत्रोत्थान के अवसर पर इस प्रकार—॥१५॥ वे अपनी-अपनी धिष्ण्या के पास बैठ जाते हैं। एक बार वाणी के रस ने देवों से, जिन्होंने इसको जीत लिया था, अलग होना चाहा। उसने पृथिवी पर रेंग-रेंगकर भागने का यत्न किया। पृथिवी ही वाणी है। ये जो ओषधियाँ या वनस्पतियाँ हैं यही इसका रस हैं। उसको इसी साम के द्वारा पकड़ा। इस प्रकार पकड़ने पर वह लौट आया। इसीलिए भूमि पर ओषधियाँ और वनस्पतियाँ ऊपर को उगीं। इसी प्रकार वाणी का रस इन यजमानों को भी जिन्होंने इसको जीत लिया है छोड़ना चाहता है, और इस भूमि पर बहकर भागने की कोशिश करता है। क्योंकि यह पृथिवी वाणी है और इसका रस ये ओषधियाँ और वनस्पतियाँ हैं। इसी साम के द्वारा वे इसको पकड़ते हैं और पकड़ा जाने पर वह लौट आता है, इसलिए इस पृथिवी पर ओषधियाँ ऊपर को उगती हैं और वनस्पतियाँ भी ऊपर को ही उगती हैं ॥१६॥ सर्पराज्ञी ऋचाओं से स्तुति करते हैं। यह पृथिवी सर्पराज्ञी है। इसके द्वारा ये सब चीजों की प्राप्ति करते हैं। उद्गाता अकेले ही स्तुति करता है (बिना प्रस्तोता के) और उपगाता भी साथ में नहीं होते, इसलिए कि कोई इसे सुन न ले। अति हो जाय यदि कोई दूसरा स्तुति करे। अति हो जाय यदि दूसरा गावे। अति हो जाय यदि दूसरा सुन ले। इसलिए बिना उपगाता की सहायता के उद्गाता स्वयं ही स्तुति करता है ॥१७॥ होता चतुर्होतृ का पाठ करता है और उस स्तुति के बाद शस्त्र पढ़ता है। यदि होता उनको न जानता हो तो गृहपति पढ़े। परन्तु है तो यह होता के पढ़ने के लिए ही ॥१८॥ अब अध्वर्यु प्रत्युत्तर देता है—‘ये यजमान सफल हो गये। इनका कल्याण हो।’ इस