भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ४, ब्रा० ३, कं० १-१४ शतपथब्राह्मण / ८१ अध्याय ४—ब्राह्मण ३ जो अग्नि सामिधेनियों द्वारा जलाई जाती है वह अन्य अग्नियों से अधिक चमकती है, क्योंकि वह ‘अनवधृष्य’ है अर्थात् उस पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता, और वह ‘अनवमृश्य’ है अर्थात् उसे कोई बुझा नहीं सकता ॥१॥ जैसे सामिधेनियों द्वारा जलाई गई अग्नि चमकती है, इसी प्रकार वह ब्राह्मण भी चमकता है जो सामिधेनियों को जानता और बोलता है, क्योंकि वह ‘अनवधृष्य’ और ‘अनवमृश्य’ हो जाता है, (अर्थात्) कोई उस पर आक्रमण नहीं कर सकता और न उसे पराजित कर सकता है ॥२॥ अब वह कहता है ‘प्र व’ (पहली सामिधेनी) । ‘प्राण’ शब्द में ‘प्र’ अक्षर आता है । इस सामिधेनी द्वारा वह ‘प्राण’ को ही प्रज्वलित करता है। अब कहा—‘अग्नऽआयाहि वीतये’ (दूसरी सामिधेनी) । ‘अपान’ ऐसा ही है। इससे वह ‘अपान’ को प्रज्वलित करता है। अब कहा— ‘बृहच्छोचा यविष्ठ्य’ (तीसरी सामिधेनी) । ‘उदान’ ही बृहच्छोचा है। इससे वह ‘उदान’ को प्रज्वलित करता है ॥३॥ अब कहा—‘स नः पृथु श्रवाय्यम्’ (चौथी सामिधेनी) । कान ही ‘पृथु श्रवाय्य’ है । क्योंकि कान से ही निकट और दूर का सुनते हैं। इससे कान को ही प्रज्वलित करता है ॥४॥ अब कहा—‘ईडेन्यो नमस्य’ (पाँचवीं सामिधेनी) । वाणी ही ‘ईडेन्य’ है । वाणी ही इस सबकी स्तुति करती है । वाणी ही से इस सबकी स्तुति की जाती है। इससे वाणी को ही प्रज्वलित करता है ॥५॥ अब कहा—‘अश्वो न देववाहनः’ (छठवीं सामिधेनी) । मन ही देववाहन है, क्योंकि मन ही देवों तक विद्वानों को ले जाता है। इससे मन को ही प्रज्वलित करता है ॥६॥ अब कहता है—‘अग्ने दीद्यतं बृहत्’ (सातवीं सामिधेनी) । आँख ही चमकनेवाली है । आँख को ही इससे प्रज्वलित करता है ॥७॥ अब कहा—‘अग्निं दूतं वृणीमहे’ (आठवीं सामिधेनी) । यह जो मध्यम प्राण है उसी को इससे प्रज्वलित करता है। यह प्राणों में अन्तस्थ (अर्थात् भीतर से प्रेरणा करनेवाली) है । इसी से और प्राण ऊपर को चलते हैं और इसी से अन्य प्राण नीचे को चलते हैं, क्योंकि यह अन्तस्थ है। जो प्राणों की इस अन्तस्थ शक्ति को समझता है उसे अन्तस्थ मानते हैं ॥८॥ अब कहा—‘शोचिष्केशस्तमीमहे’ (नवीं सामिधेनी) । ‘शिश्न’ (उपस्थेन्द्रिय) ही शोचिष्केश है। यह इन्द्रिय ही इस इन्द्रिय वाले को जलाती है। इससे शिश्न को ही प्रज्वलित करता है ॥९॥ अब कहा—‘समिद्धोऽअग्न ! आहुत’ (दसवीं सामिधेनी) । यह जो नीचे का प्राण है उसी को इससे प्रज्वलित करता है। अब कहा—‘आ जुहोता दुवस्यत’ (ग्यारहवीं सामिधेनी) । इससे समस्त शरीर को नख से लेकर रोम-रोम तक प्रज्वलित करता है ॥१०॥ और यदि पहली सामिधेनी के पढ़ते समय कोई उसे बुरा कहे तो उसके प्रति कहना चाहिए कि तूने अपना प्राण अग्नि में डाल दिया। इस अपने प्राण से तुझे दुःख होगा और ऐसा ही होगा भी ॥११॥ और अगर दूसरी सामिधेनी के समय बुरा कहे तो उससे कहे कि तूने अपने अपान को अग्नि में डाल दिया। तुझे अपने इस अपान से पीड़ा होगी और ऐसा ही होगा भी ॥१२॥ और अगर तीसरी सामिधेनी के समय बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने अपने उदान को अग्नि में डाल दिया। इस अपने उदान से तुझे पीड़ा होगी और ऐसा ही होगा भी ॥१३॥ और अगर चौथी सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने