शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ शिवताण्डवस्तोत्रम् करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात् मायादि रहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ ॥ १ ॥ निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं । करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहं ।२। निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणोंके धाम, संसारसे परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं । स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ।३। जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर मैं करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर नदीगंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं ॥ ३ ॥ चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं