भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 116
१०२* संक्षिप्त शिवपुराण *

छोटे रुद्राक्षको विद्वानोंने दसगुना अधिक फल देनेवाला बताया है। पापोंका नाश करनेके लिये रुद्राक्ष-धारण आवश्यक बताया गया है। वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंका साधक है। अतः अवश्य ही उसे धारण करना चाहिये। परमेश्वरि! लोकमें मंगलमय रुद्राक्ष जैसा फल देनेवाला देखा जाता है, वैसी फलदायिनी दूसरी कोई माला नहीं दिखायी देती। देवि! समान आकार-प्रकारवाले, चिकने, मजबूत, स्थूल, कण्टकयुक्त (उभरे हुए छोटे-छोटे दानोंवाले) और सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थोंके दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। जिसे कीड़ोंने दूषित कर दिया हो, जो टूटा-फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्त हो तथा जो पूरा-पूरा गोल न हो, इन पाँच प्रकारके रुद्राक्षोंको त्याग देना चाहिये। जिस रुद्राक्षमें अपने-आप ही डोरा पिरोनेके योग्य छिद्र हो गया हो, वही यहाँ उत्तम माना गया है। जिसमें मनुष्यके प्रयत्नसे छेद किया गया हो, वह मध्यम श्रेणीका होता है। रुद्राक्ष-धारण बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। इस जगत्में ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके मनुष्य जिस फलको पाता है उसका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। भक्तिमान् पुरुष साढ़े पाँच सौ रुद्राक्षके दानोंका सुन्दर मुकुट बना ले और उसे सिरपर धारण करे। तीन सौ साठ दानोंको लंबे सूत्रमें पिरोकर एक हार बना ले। वैसे-वैसे तीन हार बनाकर भक्तिपरायण पुरुष उनका यज्ञोपवीत तैयार करे और उसे यथास्थान धारण किये रहे।

इसके बाद किस अंगमें कितने रुद्राक्ष धारण करने चाहिये, यह बताकर सूतजी बोले—महर्षियो! सिरपर ईशान-मन्त्रसे, कानमें तत्पुरुष-मन्त्रसे तथा गले और हृदयमें अघोर-मन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करना चाहिये। विद्वान् पुरुष दोनों हाथोंमें अघोर-बीजमन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करे। उदरपर वामदेव-मन्त्रसे पंद्रह रुद्राक्षोंद्वारा गुँथी हुई माला धारण करे अथवा अंगोंसहित प्रणवका पाँच बार जप करके रुद्राक्षकी तीन, पाँच या सात मालाएँ धारण करे अथवा मूलमन्त्र (‘नमः शिवाय’)-से ही समस्त रुद्राक्षोंको धारण करे। रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान-पानमें मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा आदिको त्याग दे। गिरिराजनन्दिनी उमे! श्वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणोंको ही धारण करना चाहिये। गहरे लाल रंगका रुद्राक्ष क्षत्रियोंके लिये हितकर बताया गया है। वैश्योंके लिये प्रतिदिन बारंबार पीले रुद्राक्षको धारण करना आवश्यक है और शूद्रोंको काले रंगका रुद्राक्ष धारण करना चाहिये—यह वेदोक्त मार्ग है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और संन्यासी—सबको नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है। इसे धारण करनेका सौभाग्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है। उमे! पहले आँवलेके बराबर और फिर उससे भी छोटे रुद्राक्ष धारण करे। जो रोगी हों, जिनमें दाने न हों, जिन्हें कीड़ोंने खा लिया हो, जिनमें पिरोनेयोग्य छेद न हों, ऐसे रुद्राक्ष मंगलाकांक्षी पुरुषोंको नहीं धारण करने चाहिये। रुद्राक्ष मेरा मंगलमय लिंग-विग्रह है। वह अन्ततोगत्वा चनेके बराबर लघुतर होता है। सूक्ष्म रुद्राक्षको ही सदा प्रशस्त माना गया है। सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों