शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * १०९
इस प्रकार बहुत कुछ कहकर मैं पवित्र हो गया।
संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान् रुद्रने नारदजीको शिक्षा दी—अपने वृत्तान्तको गुप्त रखनेके लिये उन्हें समझाया-बुझाया। परंतु वे तो शिवकी मायासे मोहित थे। इसलिये उन्होंने उनकी दी हुई शिक्षाको अपने लिये हितकर नहीं माना। तदनन्तर मुनिशिरोमणि नारद ब्रह्मलोकमें गये। वहाँ ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने कहा—'पिताजी ! मैंने अपने तपोबलसे कामदेवको जीत लिया है।' उनकी वह बात सुनकर ब्रह्माजीने भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन किया और सारा कारण जानकर अपने पुत्रको यह सब कहनेसे मना किया। परंतु नारदजी शिवकी मायासे मोहित थे। अतएव उनके चित्तमें मदका अंकुर जम गया था। उनकी बुद्धि मारी गयी थी। इसलिये नारदजी अपना सारा वृत्तान्त भगवान् विष्णुके सामने कहनेके लिये वहाँसे शीघ्र ही विष्णुलोकमें गये। नारदमुनिको आते देख भगवान् विष्णु बड़े आदरसे उठे और शीघ्र ही आगे बढ़कर उन्होंने मुनिको हृदयसे लगा लिया। मुनिके आगमनका क्या हेतु है, इसका उन्हें पहलेसे ही पता था। नारदजीको अपने आसनपर बिठाकर भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके श्रीहरिने उनसे पूछा—
भगवान् विष्णु बोले—तात! कहाँसे आते हो ? यहाँ किसलिये तुम्हारा आगमन हुआ है? मुनिश्रेष्ठ! तुम धन्य हो। तुम्हारे शुभागमनसे भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर गर्वसे भरे हुए नारदमुनिने मदसे मोहित होकर अपना सारा वृत्तान्त बड़े अभिमानके साथ कह सुनाया। नारदमुनिका वह अहंकारयुक्त वचन सुनकर मन-ही-मन भगवान् विष्णुने उनकी कामविजयके यथार्थ कारणको पूर्णरूपसे जान लिया।
तत्पश्चात् श्रीविष्णु बोले—मुनिश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, तपस्याके तो भंडार ही हो। तुम्हारा हृदय भी बड़ा उदार है। मुने! जिसके भीतर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नहीं होते, उसीके मनमें समस्त दुःखोंको देनेवाले काम, मोह आदि विकार शीघ्र उत्पन्न होते हैं। तुम तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो और सदा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त रहते हो; फिर तुममें कामविकार कैसे आ सकता है। तुम तो जन्मसे ही निर्विकार तथा शुद्ध बुद्धिवाले हो।
श्रीहरिकी कही हुई ऐसी बहुत-सी बातें सुनकर मुनिशिरोमणि नारद जोर-जोरसे हँसने लगे और मन-ही-मन भगवान्को प्रणाम करके इस प्रकार बोले—
नारदजीने कहा—स्वामिन् ! जब मुझपर आपकी कृपा है, तब बेचारा कामदेव अपना क्या प्रभाव दिखा सकता है।
ऐसा कहकर भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाकर इच्छानुसार विचरनेवाले नारदमुनि वहाँसे चले गये।
(अध्याय १-२)
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