भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 850 में से

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११२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

राजपुत्रोंसे घिरी हुई वह दिव्य स्वयंवर-सभा दूसरी इन्द्रसभाके समान अत्यन्त शोभा पा रही थी। नारदजी उस राजसभामें जा बैठे और वहाँ बैठकर प्रसन्न मनसे बार-बार यही सोचने लगे कि 'मैं भगवान् विष्णुके समान रूप धारण किये हुए हूँ। अतः वह राजकुमारी अवश्य मेरा ही वरण करेगी, दूसरेका नहीं।' मुनिश्रेष्ठ नारदको यह ज्ञात नहीं था कि मेरा मुँह कितना कुरूप है। उस सभामें बैठे हुए सब मनुष्योंने मुनिको उनके पूर्वरूपमें ही देखा। राजकुमार आदि कोई भी उनके रूप-परिवर्तनके रहस्यको न जान सके। वहाँ नारदजीकी रक्षाके लिये भगवान् रुद्रके दो पार्षद आये थे, जो ब्राह्मणका रूप धारण करके गूढ़भावसे वहाँ बैठे थे। वे ही नारदजीके रूप-परिवर्तनके उत्तम भेदको जानते थे। मुनिको कामावेशसे मूढ़ हुआ जान वे दोनों पार्षद उनके निकट गये और आपसमें बातचीत करते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे। परंतु मुनि तो कामसे विह्वल हो रहे थे। अतः उन्होंने उनकी यथार्थ बात भी अनसुनी कर दी। वे मोहित हो श्रीमतीको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे।

इसी बीचमें वह सुन्दरी राजकन्या स्त्रियोंसे घिरी हुई अन्तःपुरसे वहाँ आयी। उसने अपने हाथमें सोनेकी एक सुन्दर माला ले रखी थी। वह शुभलक्षणा राजकुमारी स्वयंवरके मध्यभागमें लक्ष्मीके समान खड़ी हुई अपूर्व शोभा पा रही थी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह भूपकन्या माला हाथमें लेकर अपने मनके अनुरूप वरका अन्वेषण करती हुई सारी सभामें भ्रमण करने लगी। नारदमुनिका भगवान् विष्णुके समान शरीर और वानर-जैसा मुँह देखकर वह कुपित हो गयी और उनकी ओरसे दृष्टि हटाकर प्रसन्न मनसे दूसरी ओर चली गयी। स्वयंवर-सभामें अपने मनोवांछित वरको न देखकर वह भयभीत हो गयी। राजकुमारी उस सभाके भीतर चुपचाप खड़ी रह गयी। उसने किसीके गलेमें जयमाला नहीं डाली। इतनेमें ही राजाके समान वेश-भूषा धारण किये भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे। किन्हीं दूसरे लोगोंने उनको वहाँ नहीं देखा। केवल उस कन्याकी ही दृष्टि उनपर पड़ी। भगवान्‌को देखते ही उस परमसुन्दरी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उसने तत्काल ही उनके कण्ठमें वह माला पहना दी। राजाका रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु उस राजकुमारीको साथ लेकर तुरंत अदृश्य हो गये और अपने

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