भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 850 में से

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पृष्ठ 129

* रुद्रसंहिता * ११५

नारदजी पूर्ववत् शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो गये। उन्हें पूर्ववत् ज्ञान प्राप्त हो गया और उनकी सारी व्याकुलता जाती रही। इससे उनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे अधिकाधिक पश्चात्ताप करते हुए बारंबार अपनी निन्दा करने लगे। उस समय उन्होंने ज्ञानीको भी मोहमें डालनेवाली भगवान् शम्भुकी मायाकी सराहना की। तदनन्तर यह जानकर कि मायाके कारण ही मैं भ्रममें पड़ गया था—यह सब कुछ मेरा मायाजनित भ्रम ही था, वैष्णवशिरोमणि नारदजी भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े। भगवान् श्रीहरिने उन्हें उठाकर खड़ा कर दिया। उस समय अपनी दुर्बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण वे यों बोले 'नाथ! मायासे मोहित होनेके कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी। इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत दुर्वचन कहे हैं, आपको शापतक दे डाला है। प्रभो! उस शापको आप मिथ्या कर दीजिये। हाय! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। अब मैं निश्चय ही नरकमें पड़ूँगा। हरे! मैं आपका दास हूँ। बताइये, मैं क्या उपाय—कौन-सा प्रायश्चित्त करूँ, जिससे मेरा पाप-समूह नष्ट हो जाय और मुझे नरकमें न गिरना पड़े।' ऐसा कहकर शुद्ध बुद्धिवाले मुनिशिरोमणि नारदजी पुनः भक्तिभावसे भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था। तब श्रीविष्णुने उन्हें उठाकर मधुर वाणीमें कहा—

भगवान् विष्णु बोले—तात! खेद न करो। तुम मेरे श्रेष्ठ भक्त हो, इसमें संशय नहीं है। मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ, सुनो। उससे निश्चय ही तुम्हारा परम हित होगा, तुम्हें नरकमें नहीं जाना पड़ेगा। भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। तुमने मदसे मोहित होकर जो भगवान् शिवकी बात नहीं मानी थी—उसकी अवहेलना कर दी थी, उसी अपराधका भगवान् शिवने तुम्हें ऐसा फल दिया है; क्योंकि वे ही कर्मफलके दाता हैं। तुम अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लो कि भगवान् शिवकी इच्छासे ही यह सब कुछ हुआ है। सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्वको दूर करनेवाले हैं। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं। उन्हींका सच्चिदानन्दरूपसे बोध होता है। वे निर्गुण और निर्विकार हैं। सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे परे हैं। वे ही अपनी मायाको लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीन रूपोंमें प्रकट होते हैं। निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं। निर्गुण अवस्थामें उन्हींका नाम शिव है। वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त और महादेव आदि नामोंसे कहे जाते हैं। उन्हींकी सेवासे ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा हुए हैं और मैं तीनों लोकोंका पालन करता हूँ। वे स्वयं ही रुद्ररूपसे सदा सबका संहार करते हैं। वे शिवस्वरूपसे सबके साक्षी हैं, मायासे भिन्न और निर्गुण हैं। स्वतन्त्र होनेके कारण वे अपनी इच्छाके अनुसार चलते हैं। उनका विहार—आचार-व्यवहार उत्तम है और वे भक्तोंपर दया करनेवाले हैं। नारदमुने! मैं तुम्हें एक सुन्दर उपाय बताता हूँ, जो सुखद, समस्त पापोंका नाशक और सदा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। तुम उसे सुनो। अपने सारे संशयोंको त्यागकर तुम भगवान् शंकरके सुयशका गान करो और सदा अनन्यभावसे शिवके शतनामस्तोत्रका पाठ करो। मुने! तुम निरन्तर उन्हींकी उपासना और उन्हींका भजन करो। उन्हींके यशको सुनो और गाओ

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