शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * १३५
श्रीसूक्तसे, सुन्दर अथर्वशीर्षके मन्त्रसे, 'आ नो भद्रा०' इत्यादि शान्तिमन्त्रसे, शान्तिसम्बन्धी दूसरे मन्त्रोंसे, भारुण्डमन्त्र और अरुणमन्त्रोंसे, अर्थाभीष्टसाम तथा देवव्रतसामसे, 'अभि त्वा०' इत्यादि रथन्तरसामसे, पुरुषसूक्तसे, मृत्युंजयमन्त्रसे तथा पंचाक्षरमन्त्रसे पूजा करे। एक सहस्त्र अथवा एक सौ एक जलधाराएँ गिरानेकी व्यवस्था करे। यह सब वेदमार्गसे अथवा नाममन्त्रोंसे करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् शंकरके ऊपर चन्दन और फूल आदि चढ़ाये। प्रणवसे ही मुखवास (ताम्बूल) आदि अर्पित करे। इसके बाद जो स्फटिकमणिके समान निर्मल, निष्कल, अविनाशी, सर्वलोककारण, सर्वलोकमय परमदेव हैं; जो ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और विष्णु आदि देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते; वेदवेत्ता विद्वानोंने जिन्हें वेदान्तमें मन-वाणीके अगोचर बताया है; जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित तथा समस्त रोगियोंके लिये औषधरूप हैं; जिनकी शिवतत्त्वके नामसे ख्याति है तथा जो शिवलिंगके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, उन भगवान् शिवका शिवलिंगके मस्तकपर प्रणवमन्त्रसे ही पूजन करे। धूप, दीप, नैवेद्य, सुन्दर ताम्बूल एवं सुरम्य आरतीद्वारा यथोक्त विधिसे पूजा करके स्तोत्रों तथा अन्य नाना प्रकारके मन्त्रोंद्वारा उन्हें नमस्कार करे। फिर अर्घ्य देकर भगवान्के चरणोंमें फूल बिखेरे और साष्टांग प्रणाम करके देवेश्वर शिवकी आराधना करे। फिर हाथमें फूल लेकर खड़ा हो जाय और दोनों हाथ जोड़कर निम्नांकित मन्त्रसे सर्वेश्वर शंकरकी पुनः प्रार्थना करे—
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर॥
'कल्याणकारी शिव! मैंने अनजानमें अथवा जान-बूझकर जो जप-पूजा आदि सत्कर्म किये हों, वे आपकी कृपासे सफल हों।'
इस प्रकार पढ़कर भगवान् शिवके ऊपर प्रसन्नतापूर्वक फूल चढ़ाये। स्वस्तिवाचन$^१$ करके नाना प्रकारकी आशीः$^२$ प्रार्थना करे। फिर शिवके ऊपर मार्जन$^३$ करना चाहिये। मार्जनके बाद नमस्कार करके अपराधके लिये क्षमा$^४$-प्रार्थना करते हुए पुनरागमनके लिये विसर्जन$^५$ करना चाहिये। इसके बाद 'अद्या'$^६$ से आरम्भ होनेवाले मन्त्रका उच्चारण करके नमस्कार करे। फिर सम्पूर्ण
१. 'ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥' इत्यादि स्वस्तिवाचनसम्बन्धी मन्त्र हैं।
२. 'काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शस्यशालिनी। देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥ सर्वे च सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥' इत्यादि आशीःप्रार्थनाएँ हैं।
३. 'ॐ आपो हि ष्ठामयोभुवः' (यजु० १९। ५०—५२) इत्यादि तीन मार्जन-मन्त्र कहे गये हैं। इन्हें पढ़ते हुए इष्टदेवपर जल छिड़कना 'मार्जन' कहलाता है।
४. 'अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। तानि सर्वाणि मे देव क्षमस्व परमेश्वर॥' इत्यादि क्षमा-प्रार्थनासम्बन्धी श्लोक हैं।
५. 'यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। अभीष्टफलदानाय पुनरागमनाय च॥' इत्यादि विसर्जनसम्बन्धी श्लोक हैं।
६. 'ॐ अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिपृता निरवद्यात्। तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः।' (यजु० ३३। ४२)