भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 179

* रुद्रसंहिता * १६५

प्रकाशरूप हैं तथा प्रकृतिसे भी परे हैं, उन परमेश्वर शिवको नमस्कार है, नमस्कार है। यह जगत् जिनसे भिन्न नहीं कहा जाता, जिनके चरणोंसे पृथ्वी तथा अन्यान्य अंगोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ, सूर्य, चन्द्रमा, कामदेव एवं अन्य देवता प्रकट हुए हैं और जिनकी नाभिसे अन्तरिक्षका आविर्भाव हुआ है, उन्हीं आप भगवान् शम्भुको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप ही सबसे उत्कृष्ट परमात्मा हैं, आप ही नाना प्रकारकी विद्याएँ हैं, आप ही हर (संहारकर्ता) हैं, आप ही सद्ब्रह्म तथा परब्रह्म हैं, आप सदा विचारमें तत्पर रहते हैं। जिनका न आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है, जिनसे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है तथा जो मन और वाणीके विषय नहीं हैं, उन महादेवजीकी स्तुति मैं कैसे कर सकूँगी ?$^१$

ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्याके धनी मुनि भी जिनके रूपोंका वर्णन नहीं कर सकते, उन्हीं परमेश्वरका वर्णन अथवा स्तवन मैं कैसे कर सकती हूँ? प्रभो! आप निर्गुण हैं, मैं मूढ़ स्त्री आपके गुणोंको कैसे जान सकती हूँ? आपका रूप तो ऐसा है, जिसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जानते हैं। महेश्वर! आपको नमस्कार है। तपोमय! आपको नमस्कार है। देवेश्वर शम्भो! मुझपर प्रसन्न होइये। आपको बारंबार मेरा नमस्कार है।$^२$

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! संध्याका यह स्तुतिपूर्ण वचन सुनकर उसके द्वारा भलीभाँति प्रशंसित हुए भक्तवत्सल परमेश्वर शंकर बहुत प्रसन्न हुए। उसका शरीर वल्कल और मृगचर्मसे ढका हुआ था। मस्तकपर पवित्र जटाजूट शोभा पा रहा था। उस समय पालेके मारे हुए कमलके समान उसके कुम्हलाये हुए मुँहको देखकर भगवान् हर दयासे द्रवित हो उससे इस प्रकार बोले।

महेश्वरने कहा—भद्रे! मैं तुम्हारी इस उत्तम तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। शुद्ध बुद्धिवाली देवि! तुम्हारे इस स्तवनसे भी मुझे बड़ा संतोष प्राप्त हुआ है। अतः इस समय अपनी इच्छाके अनुसार कोई वर माँगो। जिस वरसे तुम्हें प्रयोजन हो तथा जो तुम्हारे मनमें हो, उसे मैं यहाँ अवश्य पूर्ण करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे व्रत-नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ।


१-प्रधानपुरुषौ यस्य कायत्वेन विनिर्गतौ। तस्मादव्यक्तरूपाय शङ्कराय नमो नमः॥
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णुः कुरुते स्थितिम्। संहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः॥
नमो नमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय। समस्तलोकान्तरभूतिदाय प्रकाशरूपाय परात्पराय॥
यस्यापरं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिर्दिशः सूर्य इन्दुर्मनोजः। बहिर्मुखा नाभितश्चान्तरिक्षं तस्मै तुभ्यं शम्भवे नमोऽस्तु॥
त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः। सद्ब्रह्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः॥
यस्य नादिर्न मध्यं च नान्तमस्ति जगद्यतः। कथं स्तोष्यामि तं देवमवाङ्मनसगोचरम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। १८—२३)
२-यस्य ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः। न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीयः कथं स मे॥
स्त्रिया मया ते किं ज्ञेया निर्गुणस्य गुणाः प्रभो। नैव जानन्ति यद्रूपं सेन्द्रा अपि सुरासुराः॥
नमस्तुभ्यं महेशान नमस्तुभ्यं तपोमय। प्रसीद शम्भो देवेश भूयो भूयो नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। २४—२६)