भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

* रुद्रसंहिता * १८३

रहा हूँ। आपने कहा था, 'ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही उत्तम रूप तुम्हारे अंगविशेष—ललाटसे प्रकट होगा, जिसकी लोकमें 'रुद्र' नामसे प्रसिद्धि होगी। तुम ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हो गये, श्रीहरि जगत्‌का पालन करनेवाले हुए और मैं सगुण रुद्ररूप होकर संहार करनेवाला होऊँगा। एक स्त्रीके साथ विवाह करके लोकके उत्तम कार्यकी सिद्धि करूँगा।' अपनी कही हुई इस बातको याद करके आप अपनी ही पूर्वप्रतिज्ञाको पूर्ण कीजिये। स्वामिन्! आपका यह आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ, श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहारके हेतु बनकर प्रकट हों; सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ताके रूपमें प्रकट हुए हैं। आपके बिना हम दोनों अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हैं; अतः आप एक ऐसी कामिनीको स्वीकार करें, जो लोकहितके कार्यमें तत्पर रहे। शम्भो! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुकी और सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी जीवनसहचरी प्राणवल्लभाको ग्रहण करें।

मेरी यह बात सुनकर लोकेश्वर महादेवजीके मुखपर मुसकराहट दौड़ गयी। वे श्रीहरिके सामने मुझसे इस प्रकार बोले।

ईश्वरने कहा—ब्रह्मन्! हरे! तुम दोनों मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हो। तुम दोनोंको देखकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है। तुमलोग समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ तथा त्रिलोकीके स्वामी हो। लोकहितके कार्यमें मन लगाये रहनेवाले तुम दोनोंका वचन मेरी दृष्टिमें अत्यन्त गौरवपूर्ण हैं। किंतु सुरश्रेष्ठगण! मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं होगा; क्योंकि मैं तपस्यामें संलग्न रहकर सदा संसारसे विरक्त ही रहता हूँ और योगीके रूपमें मेरी प्रसिद्धि है। जो निवृत्तिके सुन्दर मार्गपर स्थित है, अपने आत्मामें ही रमण करता—आनन्द मानता है, निरंजन (मायासे निर्लिप्त) है, जिसका शरीर अवधूत (दिगम्बर) है, जो ज्ञानी, आत्मदर्शी और कामनासे शून्य है, जिसके मनमें कोई विकार नहीं है, जो भोगोंसे दूर रहता है तथा जो सदा अपवित्र और अमंगलवेशधारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है—यह इस समय मुझे बताओ तो सही!* मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर ही आनन्द आता है। ज्ञानहीन पुरुष ही योगको छोड़कर भोगको अधिक महत्त्व देता है। संसारमें विवाह करना पराये बन्धनमें बँधना है। इसे बहुत बड़ा बन्धन समझना चाहिये। इसलिये मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, विवाहके लिये मेरे मनमें थोड़ी-सी भी अभिरुचि नहीं है। आत्मा ही अपना उत्तम अर्थ या स्वार्थ है। उसका भलीभाँति चिन्तन करनेके कारण मेरी लौकिक स्वार्थमें प्रवृत्ति नहीं होती। तथापि जगत्‌के हितके लिये तुमने जो कुछ कहा है, उसे करूँगा। तुम्हारे वचनको गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बातको पूर्ण करनेके लिये मैं अवश्य विवाह करूँगा; क्योंकि मैं सदा भक्तोंके वशमें


* यो निवृत्तिसुमार्गस्थः स्वात्मारामो निरञ्जनः। अवधूततनुर्ज्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः॥
अविकारी ह्यभोगी च सदा शुचिरमङ्गलः। तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं वदाधुना॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १५। ३१-३२)