शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० * संक्षिप्त शिवपुराण *
ओषधियोंके साथ राज्याभिषेकके योग्य द्रव्य एकत्र किये गये। प्रत्यक्ष तीर्थोंके जलोंसे भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियोंको भगवान् शंकरने अपने पार्षदोंद्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वरसे वेदमन्त्रोंका घोष करवाया।
देवि! भगवान् विष्णुकी पूर्ण भक्तिसे महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे। इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदयसे श्रीहरिको वैकुण्ठसे बुलवाया और शुभ मुहूर्तमें श्रीहरिको उस श्रेष्ठ सिंहासनपर बिठाकर महादेवजीने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया। उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जानेके बाद महेश्वरने स्वयं ब्रह्माण्डमण्डपमें श्रीहरिका अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरोंके पास नहीं था। तदनन्तर स्वतन्त्र ईश्वर भक्तवत्सल शम्भुने श्रीहरिका स्तवन किया और अपनी पराधीनता (भक्तपरवशता)-को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए वे लोककर्ता ब्रह्मासे इस प्रकार बोले।
महेश्वरने कहा—लोकेश! आजसे मेरी आज्ञाके अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। इस बातको सभी सुन रहे हैं। तात! तुम सम्पूर्ण देवता आदिके साथ इन श्रीहरिको प्रणाम करो और ये वेद मेरी आज्ञासे मेरी ही तरह इन श्रीहरिका वर्णन करें।
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—देवि! भगवान् विष्णुकी शिवभक्ति देखकर प्रसन्नचित्त हुए वरदायक भक्तवत्सल रुद्रदेवने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वजको प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदिने भी उस समय श्रीहरिकी वन्दना की। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वरने देवताओंके समक्ष श्रीहरिको बड़े-बड़े वर प्रदान किये।
महेश बोले—हरे! तुम मेरी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और कामके दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करनेवाले दुष्टोंको दण्ड देनेवाले होओ; महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगणमें तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकारकी शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदिकी सिद्धि, दूसरी नाना प्रकारकी लीलाओंको प्रकट करनेकी शक्ति और तीसरी तीनों लोकोंमें नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करनेवाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्नपूर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो! मैं तुम्हारे भक्तोंको उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा। तुम इस मायाको भी ग्रहण करो, जिसका निवारण करना देवता आदिके लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होनेपर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाताके भी उत्पादक और पालक होओगे। मेरा हृदयरूप जो रुद्र है, वही मैं हूँ—इसमें संशय नहीं है। वह रुद्र तुम्हारा और ब्रह्मा आदि देवताओंका भी निश्चय ही पूज्य है। तुम यहाँ रहकर विशेषरूपसे सम्पूर्ण जगत्का पालन