शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सहसा क्रोध हो आया, वे ज्ञानशून्य तथा महान् अहंकारी होनेके कारण महाप्रभु रुद्रको क्रूर दृष्टिसे देखकर सबको सुनाते हुए उच्चस्वरसे कहने लगे।
दक्षने कहा—ये सब देवता, असुर, श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा ऋषि मुझे विशेषरूपसे मस्तक झुकाते हैं। परंतु वह जो प्रेतों और पिशाचोंसे घिरा हुआ महामनस्वी बनकर बैठा है, वह दुष्ट मनुष्यके समान क्यों मुझे प्रणाम नहीं करता? श्मशानमें निवास करनेवाला यह निर्लज्ज जो मुझे इस समय प्रणाम नहीं करता, इसका क्या कारण है? इसके वेदोक्त कर्म लुप्त हो गये हैं। यह भूतों और पिशाचोंसे सेवित हो मतवाला बना फिरता है और शास्त्रीय विधिकी अवहेलना करके नीतिमार्गको सदा कलंकित किया करता है। इसके साथ रहनेवाले या इसका अनुसरण करनेवाले लोग पाखण्डी, दुष्ट, पापाचारी तथा ब्राह्मणको देखकर उद्दण्डतापूर्वक उसकी निन्दा करनेवाले होते हैं। यह स्वयं ही स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला तथा रतिकर्ममें ही दक्ष है। अतः मैं इसे शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ। यह रुद्र चारों वर्णोंसे पृथक् और कुरूप है। इसे यज्ञसे बहिष्कृत कर दिया जाय। यह श्मशानमें निवास करनेवाला तथा उत्तम कुल और जन्मसे हीन है। इसलिये देवताओंके साथ यह यज्ञमें भाग न पाये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! दक्षकी कही हुई यह बात सुनकर भृगु आदि बहुत-से महर्षि रुद्रदेवको दुष्ट मानकर देवताओंके साथ उनकी निन्दा करने लगे।
दक्षकी बात सुनकर नन्दीको बड़ा रोष हुआ। उनके नेत्र चंचल हो उठे और वे दक्षको शाप देनेके विचारसे तुरंत इस प्रकार बोले।
नन्दीश्वरने कहा—अरे रे महामूढ़! दुष्टबुद्धि शठ दक्ष! तूने मेरे स्वामी महेश्वरको यज्ञसे बहिष्कृत क्यों कर दिया? जिनके स्मरणमात्रसे यज्ञ सफल और तीर्थ पवित्र हो जाते हैं, उन्हीं महादेवजीको तूने शाप कैसे दे दिया? दुर्बुद्धि दक्ष! तूने ब्राह्मणजातिकी चपलतासे प्रेरित हो इन रुद्रदेवको व्यर्थ ही शाप दे डाला है। महाप्रभु रुद्र सर्वथा निर्दोष हैं, तथापि तूने व्यर्थ ही उनका उपहास किया है। ब्राह्मणाधम! जिन्होंने इस जगत्की सृष्टि की, जो इसका पालन करते हैं और अन्तमें जिनके द्वारा इसका संहार होगा, उन्हीं इन महेश्वर-रूपको तूने शाप कैसे दे दिया।
नन्दीके इस प्रकार फटकारनेपर प्रजापति दक्ष रोषसे आग-बबूला हो गये