शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शाप सुनकर मैंने बारंबार उसकी तथा भृगु आदि ब्राह्मणोंकी भी निन्दा की। सदाशिव महादेवजी भी नन्दीकी वह बात सुनकर हँसते हुए-से मधुर वाणीमें बोले—वे नन्दीको समझाने लगे।
सदाशिवने कहा—नन्दिन्! मेरी बात सुनो। तुम तो परम ज्ञानी हो। तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। तुमने भ्रमसे यह समझकर कि मुझे शाप दिया गया, व्यर्थ ही ब्राह्मण-कुलको शाप दे डाला। वास्तवमें मुझे किसीका शाप छू ही नहीं सकता; अतः तुम्हें उत्तेजित नहीं होना चाहिये। वेद मन्त्राक्षरमय और सूक्तमय है। उसके प्रत्येक सूक्तमें समस्त देहधारियोंके आत्मा (परमात्मा) प्रतिष्ठित हैं। अतः उन मन्त्रोंके ज्ञाता नित्य आत्मवेत्ता हैं। इसलिये तुम रोषवश उन्हें शाप न दो। किसीकी बुद्धि कितनी ही दूषित क्यों न हो, वह कभी वेदोंको शाप नहीं दे सकता। इस समय मुझे शाप नहीं मिला है, इस बातको तुम्हें ठीक-ठीक समझना चाहिये। महामते! तुम सनकादि सिद्धोंको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेवाले हो। अतः शान्त हो जाओ। मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञकर्म हूँ, यज्ञोंके अंगभूत समस्त उपकरण भी मैं ही हूँ। यज्ञकी आत्मा मैं हूँ। यज्ञपरायण यजमान भी मैं हूँ और यज्ञसे बहिष्कृत भी मैं ही हूँ। यह कौन, तुम कौन और ये कौन? वास्तवमें सब मैं ही हूँ। तुम अपनी बुद्धिसे इस बातका विचार करो। तुमने ब्राह्मणोंको व्यर्थ ही शाप दिया है। महामते! नन्दिन्! तुम तत्त्वज्ञानके द्वारा प्रपंच-रचनाका बाध करके आत्मनिष्ठ ज्ञानी एवं क्रोध आदिसे शून्य हो जाओ।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् शम्भुके इस प्रकार समझानेपर नन्दिकेश्वर विवेकपरायण हो क्रोधरहित एवं शान्त हो गये। भगवान् शिव भी अपने प्राणप्रिय पार्षद नन्दीको शीघ्र ही तत्त्वका बोध कराकर प्रमथगणोंके साथ वहाँसे प्रसन्नता-पूर्वक अपने स्थानको चल दिये। इधर रोषावेशसे युक्त दक्ष भी ब्राह्मणोंसे घिरे हुए अपने स्थानको लौट गये। परंतु उनका चित्त शिवद्रोहमें ही तत्पर था। उस समय रुद्रको शाप दिये जानेकी घटनाका स्मरण करके दक्ष सदा महान् रोषसे भरे रहते थे। उनकी बुद्धिपर मूढ़ता छा गयी थी। वे शिवके प्रति श्रद्धाको त्यागकर शिवपूजकोंकी निन्दा करने लगे। तात नारद! इस प्रकार परमात्मा शम्भुके साथ दुर्व्यवहार करके दक्षने अपनी जिस दुष्टबुद्धिका परिचय दिया था, वह मैंने तुम्हें बता दी। अब तुम उनकी पराकाष्ठाको पहुँची हुई दुर्बुद्धिका वृत्तान्त सुनो, मैं बता रहा हूँ।
(अध्याय २६)
दक्षके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन, उसमें ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं और ऋषियोंका आगमन, दक्षद्वारा सबका सत्कार, यज्ञका आरम्भ, दधीचिद्वारा भगवान् शिवको बुलानेका अनुरोध और दक्षके विरोध करनेपर शिव-भक्तोंका वहाँसे निकल जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! एक समय दक्षने एक बहुत बड़े यज्ञका आरम्भ किया। उस यज्ञकी दीक्षा लेकर उन्होंने उस समय समस्त देवर्षियों, महर्षियों तथा देवताओंको