भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

संलग्न हो गये, उस समय वहाँ भगवान् शंकरको उपस्थित न देख शिवभक्त दधीचिका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और वे यों बोले।

दधीचिने कहा—मुख्य-मुख्य देवताओ तथा महर्षियो! आप सब लोग प्रशंसा-पूर्वक मेरी बात सुनें। इस यज्ञ-महोत्सवमें भगवान् शंकर नहीं आये हैं, इसका क्या कारण है? यद्यपि ये देवेश्वर, बड़े-बड़े मुनि और लोकपाल यहाँ पधारे हैं, तथापि उन महात्मा पिनाकपाणि शंकरके बिना यह यज्ञ अधिक शोभा नहीं पा रहा है। बड़े-बड़े विद्वान् कहते हैं कि मंगलमय भगवान् शिवकी कृपादृष्टिसे ही समस्त मंगल-कार्य सम्पन्न होते हैं। जिनका ऐसा प्रभाव है, वे पुराण-पुरुष, वृषभध्वज, परमेश्वर श्रीनीलकण्ठ यहाँ क्यों नहीं दिखायी दे रहे हैं? दक्ष! जिनके सम्पर्कमें आनेपर अथवा जिनके स्वीकार कर लेनेपर अमंगल भी मंगल हो जाते हैं तथा जिनके पंद्रह नेत्रोंसे देखे जानेपर बड़े-बड़े नगर तत्काल मंगलमय हो जाते हैं, उनका इस यज्ञमें पदार्पण होना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये तुम्हें स्वयं ही परमेश्वर शिवको यहाँ शीघ्र बुलाना चाहिये अथवा ब्रह्मा, प्रभावशाली भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, लोकपालगणों, ब्राह्मणों और सिद्धोंकी सहायतासे सर्वथा प्रयत्न करके इस समय यज्ञकी पूर्तिके लिये तुम्हें भगवान् शंकरको यहाँ ले आना चाहिये। आप सब लोग उस स्थानपर जायँ, जहाँ महेश्वरदेव विराजमान हैं। वहाँसे दक्षनन्दिनी सतीके साथ भगवान् शम्भुको यहाँ तुरंत ले आयें। देवेश्वरो! जगदम्बासहित वे परमात्मा शिव यदि यहाँ आ गये तो उनसे सब कुछ पवित्र हो जायगा; उनके स्मरणसे, उनके नाम लेनेसे सारा कार्य पुण्यमय बन जाता है। अतः पूर्ण प्रयत्न करके भगवान् वृषभध्वजको यहाँ ले आना चाहिये। भगवान् शंकरके यहाँ पदार्पण करते ही यह यज्ञ पवित्र हो जायगा; अन्यथा यह पूरा नहीं हो सकेगा—यह मैं सत्य कहता हूँ।

दधीचिका यह वचन सुनकर दुष्ट बुद्धिवाले मूढ़ दक्षने हँसते हुए-से रोष-पूर्वक कहा—'भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, जिनमें सनातन धर्म प्रतिष्ठित है। जब इनको मैंने सादर बुला लिया है तब इस यज्ञकर्ममें क्या कमी हो सकती है? जिनमें वेद, यज्ञ और नाना प्रकारके समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् विष्णु तो यहाँ आ ही गये हैं। इनके सिवा सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्मा वेदों, उपनिषदों और विविध आगमोंके साथ यहाँ पधारे हैं। देवगणोंके साथ स्वयं देवराज इन्द्रका भी शुभागमन हुआ है तथा आप-जैसे निष्पाप महर्षि भी यहाँ आ गये हैं। जो-जो महर्षि यज्ञमें सम्मिलित होनेके योग्य, शान्त और सुपात्र हैं, वेद और वेदार्थके तत्त्वको जाननेवाले हैं और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं, वे सब और स्वयं आप भी जब यहाँ पदार्पण कर चुके हैं, तब हमें यहाँ रुद्रसे क्या प्रयोजन है? विप्रवर! मैंने ब्रह्माजीके कहनेसे ही अपनी कन्या रुद्रको ब्याह दी थी। वैसे मैं जानता हूँ, हर कुलीन नहीं हैं। उनके न माता हैं न पिता। वे भूतों, प्रेतों और पिशाचोंके स्वामी हैं। अकेले रहते हैं। उनका अतिक्रमण करना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वे आत्मप्रशंसक, मूढ़, जड,