शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २१९
निर्भय कीजिये। महाप्रभो! उस यज्ञमें दक्ष आदि सभी दुष्टोंने घमंडमें आकर आपका विशेषरूपसे अपमान किया है। कल्याणकारी शिव! इस प्रकार हमने अपना, सतीदेवीका और मूढ़ बुद्धिवाले दक्ष आदिका भी सारा वृत्तान्त कह सुनाया। अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! अपने पार्षदोंकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने वहाँकी सारी घटना जाननेके लिये शीघ्र ही तुम्हारा स्मरण किया। देवर्षे! तुम दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हो। अतः भगवान्के स्मरण करनेपर तुम तुरंत वहाँ आ पहुँचे और शंकरजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके खड़े हो गये। स्वामी शिवने तुम्हारी प्रशंसा करके तुमसे दक्षयज्ञमें गयी हुई सतीका समाचार तथा दूसरी घटनाओंको पूछा। तात! शम्भुके पूछनेपर शिवमें मन लगाये रखनेवाले तुमने शीघ्र ही वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया, जो दक्षयज्ञमें घटित हुआ था। मुने! तुम्हारे मुखसे निकली हुई बात सुनकर उस समय महान् रौद्र पराक्रमसे सम्पन्न सर्वेश्वर रुद्रने तुरंत ही बड़ा भारी क्रोध प्रकट किया। लोकसंहारकारी रुद्रने अपने सिरसे एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक उस पर्वतके ऊपर दे मारा। मुने! भगवान् शंकरके पटकनेसे उस जटाके दो टुकड़े हो गये और महाप्रलयके समान भयंकर शब्द प्रकट हुआ। देवर्षे! उस जटाके पूर्वभागसे महाभयंकर महाबली वीरभद्र प्रकट हुए, जो समस्त शिवगणोंके अगुआ हैं। वे भूमण्डलको सब ओरसे व्याप्त करके उससे भी दस अंगुल अधिक होकर खड़े हुए। वे देखनेमें प्रलयाग्निके समान जान पड़ते थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा था। वे एक हजार भुजाओंसे युक्त थे। उन सर्वसमर्थ महारुद्रके क्रोधपूर्वक प्रकट हुए निःश्वाससे सौ प्रकारके ज्वर और तेरह प्रकारके संनिपात रोग पैदा हो गये। तात! उस जटाके दूसरे भागसे महाकाली उत्पन्न हुईं, जो बड़ी भयंकर दिखायी देती थीं। वे करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई थीं। जो ज्वर पैदा हुए, वे सब-के-सब शरीरधारी, क्रूर और समस्त लोकोंके लिये भयंकर थे। वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो सब ओर दाह उत्पन्न करते हुए-से प्रतीत होते थे। वीरभद्र बातचीत करनेमें बड़े कुशल थे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर परमेश्वर शिवको प्रणाम करके कहा।
वीरभद्र बोले—महारुद्र! सोम, सूर्य और अग्निको तीन नेत्रोंके रूपमें धारण करनेवाले प्रभो! शीघ्र आज्ञा दीजिये।