शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
खिल उठा था। इसके बाद प्रसन्नचित्त हुए समस्त देवताओं, दूसरे-दूसरे सिद्धों, ऋषियों और प्रजापतियोंने भी शंकरजीका सहर्ष स्तवन किया। इसके अतिरिक्त उपदेवों, नागों, सदस्यों तथा ब्राह्मणोंने पृथक्-पृथक् प्रणामपूर्वक बड़े भक्तिभावसे उनकी स्तुति की (अध्याय ४१-४२)
भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवताओंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, सब देवता आदिका अपने-अपने स्थानको जाना, सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार श्रीविष्णुके, मेरे, देवताओं और ऋषियोंके तथा अन्य लोगोंके स्तुति करनेपर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन शम्भुने समस्त ऋषियों, देवता आदिको कृपादृष्टिसे देखकर तथा मुझ ब्रह्मा और विष्णुका समाधान करके दक्षसे इस प्रकार कहा।
महादेवजी बोले—प्रजापति दक्ष! मैं जो कुछ कहता हूँ, सुनो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। यद्यपि मैं सबका ईश्वर और स्वतन्त्र हूँ तो भी सदा ही अपने भक्तोंके अधीन रहता हूँ। चार प्रकारके पुण्यात्मा पुरुष मेरा भजन करते हैं। दक्ष प्रजापते! उन चारों भक्तोंमें पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। उनमें पहला आर्त, दूसरा जिज्ञासु, तीसरा अर्थार्थी और चौथा ज्ञानी है। पहलेके तीन तो सामान्य श्रेणीके भक्त हैं। किंतु चौथाका अपना विशेष महत्त्व है। उन सब भक्तोंमें चौथा ज्ञानी ही मुझे अधिक प्रिय है। वह मेरा रूप माना गया है। उससे बढ़कर दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।* मैं आत्मज्ञ हूँ। वेद-वेदान्तके पारगामी विद्वान् ज्ञानके द्वारा मुझे जान सकते हैं। जिनकी बुद्धि मन्द है, वे ही ज्ञानके बिना मुझे पानेका प्रयत्न करते हैं। कर्मके अधीन हुए मूढ़ मानव मुझे वेद, यज्ञ, दान और तपस्याद्वारा भी कभी नहीं पा सकते।
अतः दक्ष! आजसे तुम बुद्धिके द्वारा मुझ परमेश्वरको जानकर ज्ञानका आश्रय ले समाहितचित्त होकर कर्म करो। प्रजापते! तुम उत्तम बुद्धिके द्वारा मेरी दूसरी बात भी सुनो। मैं अपने सगुण स्वरूपके विषयमें भी इस गोपनीय रहस्यको धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे सामने प्रकट करता हूँ। जगत्का परम कारणरूप मैं ही ब्रह्मा और विष्णु हूँ। मैं
* चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा। उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठास्तेषां दक्ष प्रजापते॥
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चैव चतुर्थकः। पूर्वे त्रयश्च सामान्याश्चतुर्थो हि विशिष्यते॥
तत्र ज्ञानी प्रियतरो मम रूपं च स स्मृतः। तस्मात्प्रियतरो नान्यः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
(शि० पु० रू० सं० स० खं० ४३। ४–६)