शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
मेना बोलीं—देवि! इस समय मुझे आपके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। अतः मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ। कालिके! इसके लिये आप प्रसन्न हों।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाके ऐसा कहनेपर सर्वमोहिनी कालिकादेवीने मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी दोनों बाहोंसे खींचकर मेनाको हृदयसे लगा लिया। इससे उन्हें तत्काल महाज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। फिर तो मेनादेवी प्रिय वचनोंद्वारा भक्ति-भावसे अपने सामने खड़ी हुई कालिकाकी स्तुति करने लगीं।
मेना बोलीं—जो महामाया जगत्को धारण करनेवाली चण्डिका, लोकधारिणी तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाली हैं, उन महादेवीको मैं प्रणाम करती हूँ। जो नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली माया, योगनिद्रा, जगज्जननी तथा सुन्दर कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, उन नित्य-सिद्धा उमादेवीको मैं नमस्कार करती हूँ। जो सबकी मातामही, नित्य आनन्दमयी, भक्तोंके शोकका नाश करनेवाली तथा कल्पपर्यन्त नारियों एवं प्राणियोंकी बुद्धिरूपिणी हैं, उन देवीको मैं प्रणाम करती हूँ। आप यतियोंके अज्ञानमय बन्धनके नाशकी हेतुभूता ब्रह्मविद्या हैं। फिर मुझ-जैसी नारियाँ आपके प्रभावका क्या वर्णन कर सकती हैं। अथर्ववेदकी जो हिंसा (मारण आदिका प्रयोग) है, वह आप ही हैं। देवि! आप मेरे अभीष्ट फलको सदा प्रदान कीजिये। भावहीन (आकाररहित) तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओंसे आप ही पंचभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं। आप ही उनकी शाश्वत शक्ति हैं। आपका स्वरूप नित्य है। आप समय-समयपर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें प्रकट होती हैं। आप ही जगत्की योनि और आधार-शक्ति हैं। आप ही प्राकृत तत्त्वोंसे परे नित्या प्रकृति कही गयी हैं। जिसके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको वशमें किया जाता (जाना जाता) है, वह नित्या विद्या आप ही हैं। मातः! आज मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उग्र दाहिका शक्ति हैं। आप ही सूर्य-किरणोंमें स्थित प्रकाशिका शक्ति हैं। चन्द्रमामें जो आह्लादिका शक्ति है, वह भी आप ही हैं। ऐसी आप चण्डी-देवीका मैं स्तवन और वन्दन करती हूँ। आप स्त्रियोंको बहुत प्रिय हैं। ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियोंकी ध्येयभूता नित्या ब्रह्मशक्ति