भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 287
* रुद्रसंहिता *२७३

कुछ उल्लास हुआ और वे उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ विनीतभावसे बोले।

देवताओंने कहा—देवदेव ! महादेव ! करुणासागर ! प्रभो ! आप कामदेवको शीघ्र जीवन-दान दें तथा रतिके प्राणोंकी रक्षा करें।

देवताओंकी यह बात सुनकर सबके स्वामी करुणासागर परमेश्वर शिव पुनः प्रसन्न होकर बोले—'देवताओ! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं कामको सबके हृदयमें जीवित कर दूँगा। वह सदा मेरा गण होकर विहार करेगा। अब अपने स्थानको जाओ। मैं तुम्हारे दुःखका सर्वथा नाश करूँगा।'

ऐसा कहकर रुद्रदेव उस समय स्तुति करनेवाले देवताओंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओंका विस्मय दूर हो गया और वे सब-के-सब प्रसन्न हो गये। मुने ! तदनन्तर रुद्रकी बातपर भरोसा करके स्थिर रहनेवाले देवता रतिको उनका कथन सुनाकर आश्वासन दे अपने-अपने स्थानको चले गये। मुनीश्वर ! कामपत्नी रति शिवके बताये हुए शम्बरनगरको चली गयी तथा रुद्रदेवने जो समय बताया था, उसकी प्रतीक्षा करने लगी। (अध्याय १८-१९)


ब्रह्माजीका शिवकी क्रोधाग्निको वडवानलकी संज्ञा दे समुद्रमें स्थापित करके संसारके भयको दूर करना, शिवके विरहसे पार्वतीका शोक तथा नारदजीके द्वारा उन्हें तपस्याके लिये उपदेशपूर्वक पंचाक्षर-मन्त्रकी प्राप्ति

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! जब भगवान् रुद्रके तीसरे नेत्रसे प्रकट हुई अग्निने कामदेव-को शीघ्र जलाकर भस्म कर दिया, तब वह बिना किसी प्रयोजनके ही प्रज्वलित हो सब ओर फैलने लगी। इससे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें महान् हाहाकार मच गया। तात ! सम्पूर्ण देवता और ऋषि तुरंत मेरी शरणमें आये। उन सबने अत्यन्त व्याकुल होकर मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़ मुझे प्रणाम किया और मेरी स्तुति करके वह दुःख निवेदन किया। वह सुनकर मैं भगवान् शिवका स्मरण करके उसके हेतुका भलीभाँति विचारकर तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये विनीतभावसे वहाँ पहुँचा। वह अग्नि ज्वालामालाओंसे अत्यन्त उद्दीप्त हो जगत्‌को जला देनेके लिये उद्यत थी। परंतु भगवान् शिवकी कृपासे प्राप्त हुए उत्तम तेजके द्वारा मैंने उसे तत्काल स्तम्भित कर दिया। मुने ! त्रिलोकीको दग्ध करनेकी इच्छा रखनेवाली उस क्रोधमय अग्निको मैंने एक ऐसे घोड़ेके रूपमें परिणत कर दिया, जिसके मुखसे सौम्य ज्वाला प्रकट हो रही थी। भगवान् शिवकी इच्छासे उस वाडव शरीर (घोड़े)-वाली अग्निको लेकर मैं लोकहितके लिये समुद्रतटपर गया। मुने ! मुझे आया देख समुद्र एक दिव्य पुरुषका रूप धारण करके हाथ जोड़े हुए मेरे पास आया। मुझ सम्पूर्ण लोकोंके पितामहकी भलीभाँति विधिवत् स्तुति-वन्दना करके सिन्धुने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा।