शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * २७७
श्रीशिवकी आराधनाके लिये पार्वतीजीकी दुष्कर तपस्या
ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! तुम्हारे चले जानेपर प्रफुल्लचित्त हुई पार्वतीने महादेवजी-को तपस्यासे ही साध्य माना और तपस्याके लिये ही मनमें निश्चय किया। तब उन्होंने अपनी सखी जया और विजयाके द्वारा पिता हिमाचल और माता मेनासे आज्ञा माँगी। पिताने तो स्वीकार कर लिया; परंतु माता मेनाने स्नेहवश अनेक प्रकारसे समझाया और घरसे दूर वनमें जाकर तप करनेसे पुत्रीको रोका। मेनाने तपस्याके लिये वनमें जानेसे रोकते हुए 'उ', 'मा' ( बाहर न जाओ ) ऐसा कहा; इसलिये उस समय शिवाका नाम उमा हो गया। मुने! शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने रोकनेसे शिवाको दुःखी हुई जान अपना विचार बदल दिया और पार्वतीको तपस्याके लिये जानेकी आज्ञा दे दी। मुनिश्रेष्ठ! माताकी वह आज्ञा पाकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पार्वतीने भगवान् शंकरका स्मरण करके अपने मनमें बड़े सुखका अनुभव किया। माता-पिताको प्रसन्नता पूर्वक प्रणाम करके शिवके स्मरणपूर्वक दोनों सखियोंके साथ वे तपस्या करनेके लिये चली गयीं। अनेक प्रकारके प्रिय वस्त्रोंका परित्याग करके पार्वतीने कटि प्रदेशमें सुन्दर मूँजकी मेखला बाँध शीघ्र ही वल्कल धारण कर लिये। हारका परिहार करके उत्तम मृगचर्मको हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् वे तपस्याके लिये गंगावतरण ( गंगोत्तरी ) तीर्थकी ओर चलीं।
जहाँ ध्यान लगाते हुए भगवान् शंकरने कामदेवको दग्ध किया था, हिमालयका वह शिखर गंगावतरणके नामसे प्रसिद्ध है। वहीं परम उत्तम शृंगितीर्थमें पार्वतीने तपस्या प्रारम्भ की। गौरीके तप करनेसे ही उसका 'गौरी-शिखर' नाम हो गया। मुने! शिवाने अपने तपकी परीक्षाके लिये वहाँ बहुत-से सुन्दर एवं पवित्र वृक्ष लगाये, जो फल देनेवाले थे। सुन्दरी पार्वतीने पहले भूमि-शुद्ध करके वहाँ एक वेदीका निर्माण किया। तदनन्तर ऐसी तपस्या आरम्भ की, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर थी। वे मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको शीघ्र ही काबूमें करके उस वेदीपर उच्चकोटिकी तपस्या करने लगीं। ग्रीष्म-ऋतुमें अपने चारों ओर दिन-रात आग जलाये रखकर वे बीचमें बैठतीं और निरन्तर पंचाक्षर-मन्त्रका जप करती रहती थीं। वर्षा-ऋतुमें वेदीपर सुस्थिर आसनसे बैठकर अथवा किसी पत्थरकी चट्टानपर ही आसन लगाकर वे निरन्तर वर्षाकी जलधारासे भीगती रहती थीं। शीतकालमें निराहार रहकर भगवान् शंकरके भजनमें तत्पर हो वे सदा शीतल जलके भीतर खड़ी रहतीं तथा रातभर बरफकी चट्टानोंपर बैठा करती थीं। इस प्रकार तप करती हुई पंचाक्षर-मन्त्रके जपमें संलग्न हो शिवा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंके दाता शिवका ध्यान करती थीं। प्रतिदिन अवकाश मिलनेपर वे सखियोंके साथ अपने लगाये हुए वृक्षोंको प्रसन्नतापूर्वक सींचतीं और वहाँ पधारे हुए अतिथिका आतिथ्य-सत्कार भी करती थीं।