शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता *
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धारण किये भूतों तथा प्रेत आदिके साथ रहते हैं और नंग-धड़ंग हो शूल धारण किये घूमते हैं। धूर्त नारदने अपनी मायासे तुम्हारे सारे विज्ञानको नष्ट कर दिया, युक्तिसे तुम्हें मोह लिया और तुमसे तप करवाया। देवेश्वरि! गिरिराजनन्दिनि! तुम्हीं विचार करो कि ऐसे वरको पाकर तुम्हें क्या सुख मिलेगा। पहले रुद्रने बुद्धिसे खूब सोच-विचारकर साध्वी सतीसे विवाह किया। परंतु वे ऐसे मूढ़ हैं कि कुछ दिन भी उनके साथ निबाह न सके। उस बेचारीको वैसे ही दोष देकर उन्होंने त्याग दिया और स्वयं स्वतन्त्र हो अपने निष्कल और शोकरहित स्वरूपका ध्यान करते हुए उसीमें सुखपूर्वक रम गये। देवि! जो सदा अकेले रहनेवाले, शान्त, संगरहित और अद्वितीय हैं, उनके साथ किसी स्त्रीका निर्वाह कैसे होगा? आज भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम हमारी आज्ञा मानकर घर लौट चलो और इस दुर्बुद्धिको त्याग दो। महाभागे! इससे तुम्हारा भला होगा। तुम्हारे योग्य वर हैं भगवान् विष्णु, जो समस्त सद्गुणोंसे युक्त हैं। वे वैकुण्ठमें रहते हैं, लक्ष्मीके स्वामी हैं और नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करनेमें कुशल हैं। उनके साथ हम तुम्हारा विवाह करा देंगे और वह विवाह तुम्हारे लिये समस्त सुखोंको देनेवाला होगा। पार्वती! तुम्हारा जो रुद्रके साथ विवाह करनेका हठ है, ऐसे हठको छोड़ दो और सुखी हो जाओ।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! उनकी ऐसी बात सुनकर जगदम्बिका पार्वती हँस पड़ीं और पुनः उन ज्ञानविशारद मुनियोंसे बोलीं।
पार्वतीने कहा—मुनीश्वरो ! आपने अपनी समझसे ठीक ही कहा है। परंतु द्विजो! मेरा हठ भी छूटनेवाला नहीं है। मेरा शरीर पर्वतसे उत्पन्न होनेके कारण मुझमें स्वाभाविक कठोरता विद्यमान है। अपनी बुद्धिसे ऐसा विचारकर आपलोग मुझे तपस्यासे रोकनेका कष्ट न करें। देवर्षिका उपदेश-वाक्य मेरे लिये परम हितकारक है। इसलिये मैं उसे कभी नहीं छोड़ूँगी। वेदवेत्ता भी यह मानते हैं कि गुरुजनोंका वचन हितकारक होता है। ‘गुरुओंका वचन सत्य होता है’, ऐसा जिनका दृढ़ विचार है, उन्हें इहलोक और परलोकमें परम सुखकी प्राप्ति होती है और दुःख कभी नहीं होता। ‘गुरुओंका वचन सत्य होता है’ यह विचार जिनके हृदयमें नहीं है, उन्हें इहलोक और परलोकमें भी दुःख ही प्राप्त होता है, सुख कभी नहीं मिलता। अतः द्विजो! गुरुओंके वचनका कभी किसी तरह भी त्याग नहीं करना चाहिये। मेरा घर बसे या उजड़ जाय, मुझे तो यह हठ ही सदा सुख देनेवाला है।