शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
उच्छ्वासरूपसे सम्पूर्ण वेद प्रदान किये थे। अतः उनके समान उत्तम प्रभु दूसरा कौन है? जो सबके आदि कारण हैं, उनकी अवस्था अथवा आयुका माप-तौल कैसे हो सकता है? प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है। फिर उनकी शक्तिका दूसरा क्या कारण हो सकता है? जो लोग सदा प्रेमपूर्वक शक्तिके स्वामी भगवान् शंकरका भजन करते हैं, उन्हें भगवान् शम्भु प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति—ये तीनों अक्षय शक्तियाँ प्रदान करते हैं। भगवान् शिवके भजनसे ही जीव मृत्युको जीत लेता और निर्भय हो जाता है। इसलिये तीनों लोकोंमें उनका ‘मृत्युंजय’ नाम प्रसिद्ध है। उन्हींके अनुग्रहसे विष्णु विष्णुत्वको, ब्रह्मा ब्रह्मत्वको और देवता देवत्वको प्राप्त हुए हैं। शिवजीका पक्ष लेकर बहुत बोलनेसे क्या लाभ? वे भगवान् स्वयं ही महाप्रभु हैं। कल्याणरूपी शिवकी सेवासे यहाँ कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता? उन महादेवजीके पास किस बातकी कमी है, जो वे भगवान् सदाशिव स्वयं मुझे पानेकी इच्छा करें? यदि शंकरकी सेवा न करे तो मनुष्य सात जन्मोंतक दरिद्र होता है और उन्हींकी सेवासे सेवकको लोकमें कभी नष्ट न होनेवाली लक्ष्मी प्राप्त होती है। जिनके सामने आठों सिद्धियाँ नित्य आकर सिर नीचा किये इस इच्छासे नृत्य करती हैं कि वे भगवान् हमपर संतुष्ट हो जायें, उनके लिये कोई भी हितकर वस्तु दुर्लभ कैसे हो सकती है? यद्यपि यहाँ मांगलिक कही जानेवाली वस्तुएँ शंकरका सेवन नहीं करतीं, तथापि उनके स्मरणमात्रसे ही सबका मंगल होता है। जिनकी पूजाके प्रभावसे उपासककी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं, सदा निर्विकार रहनेवाले उन परमात्मा शिवमें विकार कहाँसे आ सकता है? जिस पुरुषके मुखमें निरन्तर ‘शिव’ यह मंगलमय नाम निवास करता है, उसके दर्शनमात्रसे ही अन्य सब सदा पवित्र होते हैं। जैसा कि आपने कहा है, वे चिताका भस्म लगाते हैं। परंतु यदि उनका लगाया हुआ भस्म अपवित्र होता तो उनके शरीरसे झड़कर गिरे हुए उस भस्मको देवतालोग सदा अपने सिरपर कैसे धारण करते? (अतः शिवके अंगोंके स्पर्शसे अपवित्र वस्तु भी पवित्र हो जाती है।) जो महादेव सगुण होकर तीनों लोकोंके कर्ता-भर्ता और हर्ता होते हैं तथा निर्गुणरूपमें शिव कहलाते हैं, वे बुद्धिके द्वारा पूर्णरूपसे कैसे जाने जा सकते हैं? परब्रह्म परमात्मा शिवका जो निर्गुण रूप है, उसे आप-जैसे बहिर्मुख लोग कैसे जान सकते हैं? जो दुराचारी और पापी हैं, वे देवताओंसे बहिष्कृत हो जाते हैं। ऐसे लोग निर्गुण शिवके तत्त्वको नहीं जानते। जो पुरुष तत्त्वको न जाननेके कारण यहाँ शिवकी निन्दा करता है, उसके जन्मभरका सारा संचित पुण्य भस्म हो जाता है। आपने जो यहाँ अमित तेजस्वी महादेवजीकी निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है, उससे मुझे पापकी भागिनी होना पड़ा है। शिवद्रोहीको देखकर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, शिवद्रोहीका दर्शन हो जानेपर प्रायश्चित्त करना चाहिये।
इतना कहकर पार्वतीजी उस ब्राह्मणपर अधिक रुष्ट होकर बोलीं—अरे रे दुष्ट! तूने कहा था कि मैं शंकरको जानता हूँ, परंतु निश्चय ही तूने उन सनातन शिवको नहीं