भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 311

* रुद्रसंहिता * २९७

चाहिये। मेरे पिता हिमवान्‌को यह अच्छी तरह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मेरी पुत्रीने शुभकारक तपस्या की है।

पार्वतीकी ऐसी बात सुनकर भगवान् सदाशिव बड़े प्रसन्न हुए और उनसे हँसते हुए-से प्रेमपूर्वक बोले।

शिवने कहा—देवि! महेश्वरि! मेरी यह उत्तम बात सुनो, यह उचित, मंगलकारक और निर्दोष है। इसे सुनकर वैसा ही करो। वरानने! ब्रह्मा आदि जितने भी प्राणी हैं, वे सब अनित्य हैं। भामिनि! यह सब जो कुछ दिखायी देता है, इसे नश्वर समझो। मैं निर्गुण परमात्मा ही गुणोंसे युक्त हो एकसे अनेक हो गया हूँ। जो अपने प्रकाशसे प्रकाशित होता है, वही परमात्मा मैं दूसरेके प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला हो गया। देवि! मैं स्वतन्त्र हूँ, परंतु तुमने मुझे परतन्त्र बना दिया। समस्त कर्मोंको करनेवाली प्रकृति एवं महामाया तुम्हीं हो। यह सम्पूर्ण जगत् मायामय ही रचा गया है। मुझ सर्वात्मा परमात्माने अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा इसे धारणमात्र कर रखा है। सर्वत्र परमात्मभाव रखनेवाले सर्वात्मा पुण्यवानोंने इसे अपने भीतर सींचा है तथा यह तीनों गुणोंसे आवेष्टित है। देवि! वरवर्णिनि! कौन मुख्य ग्रह हैं? कौन-से ऋतुसमूह हैं? अथवा कौन दूसरे-दूसरे उपग्रह हैं? इस समय तुमने शिवके लिये क्या कहा है—किस कर्तव्यका विधान किया है? गुण और कार्यके भेदसे हम दोनोंने इस जगत्‌में भक्तवत्सलताके कारण भक्तोंको सुख देनेके हेतु अवतार ग्रहण किया है। तुम्हीं रजःसत्त्व-तमोमयी (त्रिगुणात्मिका) सूक्ष्म प्रकृति हो, सदा व्यापारकुशल सगुणा और निर्गुणा भी हो। सुमध्यमे! मैं यहाँ सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा, निर्विकार एवं निरीह हूँ। भक्तकी इच्छासे मैंने शरीर धारण किया है। शैलजे! मैं तुम्हारे पिता हिमालयके पास नहीं जा सकता तथा भिक्षुक होकर किसी तरह तुम्हारी उनसे याचना भी नहीं कर सकता। गिरिराजनन्दिनि! महान् गुणोंसे अत्यन्त गौरवशाली महात्मा पुरुष भी अपने मुँहसे 'देहि' (दो) यह बात निकालनेपर तत्काल लघुताको प्राप्त हो जाता है। कल्याणि! ऐसा जानकर हमारे लिये क्या कहती हो? भद्रे! तुम्हारी आज्ञासे मुझे सब कुछ करना है। अतः जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।

महादेवजीके ऐसा कहनेपर भी सती-साध्वी कमलोचना महादेवी शिवाने उन भगवान् शंकरको बारंबार भक्ति-भावसे प्रणाम करके कहा।

पार्वती बोलीं—नाथ! आप आत्मा हैं और मैं प्रकृति। इस विषयमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। हम दोनों स्वतन्त्र और निर्गुण होते हुए भी भक्तोंके अधीन होनेके कारण सगुण हो जाते हैं। शम्भो! प्रभो! आपको प्रयत्नपूर्वक मेरी प्रार्थनाके अनुसार कार्य करना चाहिये। शंकर! आप मेरे लिये याचना करें और हिमवान्‌को दाता बननेका सौभाग्य प्रदान करें। महेश्वर! मैं सदा आपकी भक्ता हूँ, अतः मुझपर कृपा कीजिये। नाथ! सदा जन्म-जन्ममें मैं ही आपकी पत्नी होती रही हूँ। आप परब्रह्म परमात्मा हैं, निर्गुण हैं, प्रकृतिसे परे हैं, निर्विकार, निरीह एवं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं; तथापि भक्तोंके उद्धारमें संलग्न होकर यहाँ सगुण भी हो जाते हैं, स्वात्माराम होकर भी