भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *


था। अनेक शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके आश्चर्योंसे परिपूर्ण था। वहाँ स्थावर और जंगम सभी वस्तुएँ कृत्रिम बनी थीं; परंतु असली वस्तुओंके समान प्रतीत होती थीं। उनसे उस मण्डपकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वहाँ सब ओर ऐसी अद्भुत वस्तुएँ थीं जो उस मण्डपका सर्वस्व जान पड़ती थीं। नाना प्रकारकी निराली वस्तुओंका चमत्कार वहाँ छा रहा था। वहाँकी स्थावर वस्तुओंसे जंगम और जंगम वस्तुओंसे स्थावर पराजित हो रहे थे अर्थात् वे एक-दूसरेसे बढ़कर शोभाशाली और चमत्कारपूर्ण दिखायी देते थे। उस मण्डपकी स्थलभूमि जलसे पराजित हो रही थी। अर्थात् चतुर-से-चतुर मनुष्य भी यह नहीं जान पाते थे कि इसमें कहाँ जल है और कहाँ स्थल। कहीं कृत्रिम सिंह बने थे और कहीं सारसोंकी पंक्तियाँ। कहीं बनावटी मोर थे, जो अपनी सुन्दरतासे मनको मोहे लेते थे। कहीं कृत्रिम स्त्रियाँ थीं, जो पुरुषोंके साथ नृत्य करती हुई देखी जाती थीं। वे कृत्रिम होनेपर भी सब लोगोंकी ओर देखतीं और उनके मनको मोहमें डाल देती थीं। उसी विधिसे मनोहर द्वारपाल बने थे, जो स्थावर होनेपर भी जंगमोंके समान जान पड़ते थे। वे अपने हाथोंसे धनुष उठाकर उन्हें खींचते देखे जाते थे।

द्वारपर कृत्रिम महालक्ष्मी खड़ी थीं, जिनकी रचना अद्भुत थी। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे संयुक्त दिखायी देती थीं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो क्षीरसागरसे साक्षात् लक्ष्मी ही आ गयी हों। उस मण्डपमें स्थान-स्थानपर सजे-सजाये कृत्रिम हाथी खड़े किये गये थे, जो असली हाथियोंके समान ही प्रतीत होते थे। घुड़सवारोंसहित घोड़े और हाथीसवारों-सहित हाथी बनाये गये थे। जहाँ-तहाँ रथियोंसहित रथ बने थे, जो कृत्रिम अश्वोंसे ही खींचे जाते थे। उन्हें देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था। इनके सिवा दूसरे-दूसरे कृत्रिम वाहन भी वहाँ खड़े थे। पैदल सिपाहियोंकी कृत्रिम सेना भी वहाँ मौजूद थी। मुने! प्रसन्नचित्तवाले विश्वकर्माने देवताओं और मुनियोंको भी मोह (आश्चर्य)-में डालनेके लिये वहाँ ऐसी अद्भुत रचनाएँ की थीं। मण्डपके सबसे बड़े फाटकपर कृत्रिम नन्दी खड़ा था, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित होता था। भगवान् शिवके वाहन नन्दीकी जैसी आकृति है, ठीक वैसा ही वह भी था। उस कृत्रिम नन्दीके ऊपर रत्न-विभूषित महादिव्य पुष्पक शोभा पाता था, जो पल्लवों तथा श्वेत चामरोंसे सजाया गया था। उसके वामपार्श्वमें दो कृत्रिम हाथी खड़े थे, जिनका रंग विशुद्ध केसरके समान था। वे चार दाँतवाले बनाये गये थे और साठ वर्षके पाठोंके समान दीखते थे। वे परस्पर स्नेह करते-से प्रतीत होते थे। उनमें बड़ी चमक थी। इसी प्रकार सूर्यके समान अत्यन्त प्रकाशमान दो दिव्य अश्व भी विश्वकर्माने बनाये थे, जो चँवरसे अलंकृत और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणोंसे सम्पन्न, कवचधारी लोकपाल तथा सम्पूर्ण देवता भी वहाँ विश्वकर्माद्वारा रचे गये थे, जो ठीक उन्हीं लोकपालों और देवताओंसे मिलते-जुलते थे। इसी तरह भृगु आदि समस्त तपोधन ऋषि, अन्यान्य उपदेवता और सिद्ध भी