शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्त्रियाँ दुर्गाको साथ ले कुलदेवीकी पूजाके लिये बाहर निकलीं। वहाँ देवताओंने, जिनकी पलकें कभी नहीं गिरती थीं, प्रसन्नतापूर्वक पार्वतीको देखा। उनकी अंगकान्ति नील अंजनके समान थी। वे अपने मनोहर अंगोंसे ही विभूषित थीं। उनका कटाक्ष केवल भगवान् त्रिलोचनपर ही आदरपूर्वक पड़ता था। दूसरे किसी पुरुषकी ओर उनके नेत्र नहीं जाते थे। उनका प्रसन्नमुख मन्द मुसकानसे सुशोभित था। वे कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखती थीं और बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती थीं। उनके केशोंकी चोटी बड़ी ही सुन्दर थी। कपोलोंपर बनी हुई मनोहर पत्रभंगी उनकी शोभा बढ़ाती थी। ललाटमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ ही सिन्दूरकी बिंदी शोभा दे रही थी। वक्षःस्थलपर श्रेष्ठ रत्नोंके सारभूत हारसे दिव्य दीप्ति छिटक रही थी। रत्नोंके बने हुए केयूर, वलय और कंकणसे उनकी भुजाएँ अलंकृत थीं। उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे उनके मनोहर कपोल जगमगा रहे थे। उनकी दन्तपंक्ति मणियों तथा रत्नोंकी प्रभाको छीने लेती थी और मुखकी शोभा बढ़ाती थी। मधुसे पूरित अधर और ओष्ठ बिम्बफलके समान लाल थे। दोनों पैरोंमें रत्नोंकी आभासे युक्त महावर शोभा देता था। उन्होंने अपने एक हाथमें रत्नजटित दर्पण ले रखा था और उनका दूसरा हाथ क्रीड़ाकमलसे सुशोभित था। उनके अंगोंमें चन्दन, अगर, कस्तूरी और कुंकुमका अंगराग लगा हुआ था। पैरोंमें पायजेब बज रहे थे और वे अपने लाल-लाल तलुओंके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं। समस्त देवता आदिने जगत्की आदिकारणभूता जगज्जननी पार्वतीदेवीको देखकर भक्तिभावसे मस्तक झुका मेनासहित उन्हें प्रणाम किया। त्रिलोचन शिवने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ कनखियोंसे उन्हें देखा और उनमें सतीकी आकृति देखकर अपनी विरह-वेदनाको त्याग दिया। शिवापर आँखें गड़ाकर भगवान् शिव उस समय सब कुछ भूल गये। उनके सारे अंगोंमें रोमांच हो आया। वे हर्षका अनुभव करते हुए गौरीकी ओर देखने लगे। गौरी उनकी आँखोंमें समा गयी थीं।
इधर काली पुरीसे बाहर जाकर अम्बिकादेवीकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणपत्नियोंके साथ पुनः अपने पिताके रमणीय भवनमें लौट आयीं। भगवान् शंकर भी मुझ ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंके साथ हिमाचलके बताये हुए अपने नियत स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक गये। वहाँ गिरिराजके द्वारा नाना प्रकारकी सुन्दर समृद्धिसे सम्मानित हुए वे सब लोग सुखपूर्वक ठहर गये और भगवान् शिवकी सेवा करने लगे।
(अध्याय ४६)
वरपक्षके आभूषणोंसे विभूषित शिवाकी नीराजना, कन्यादानके समय वरके साथ सब देवताओंका हिमाचलके घरके आँगनमें विराजना तथा वर-वधूके द्वारा एक-दूसरेका पूजन
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर गिरिश्रेष्ठ हिमवान्ने प्रसन्नता और उत्साहके साथ वेदमन्त्रोंद्वारा दुर्गा और शिवका उपस्नान करवाया। तत्पश्चात् गिरिराजकी प्रार्थनासे