भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त शिवपुराण *

और आँगनमें रत्नमय सिंहासनोंके ऊपर मुझको, विष्णुको, शंकरजीको तथा अन्य विशिष्ट व्यक्तियोंको बिठाया। उस समय मेनाने अपनी सखियों, ब्राह्मणपत्नियों तथा अन्य पुरन्ध्रियोंके साथ आकर सानन्द आरती उतारीं। कर्मकाण्डके ज्ञाता पुरोहित महात्मा शंकरके लिये मधुपर्क-पूजन आदि जो-जो आवश्यक कृत्य थे, उन सबको सहर्ष सम्पन्न किया। फिर मेरे कहनेसे पुरोहितने प्रस्तावके अनुरूप उत्तम मंगलमय कार्य आरम्भ किया।

इसके बाद हिमालयने अन्तर्वेदीमें जहाँ समस्त आभूषणोंसे विभूषित उनकी कृशांगी कन्या वेदीके ऊपर विराजमान थी, वहाँ मेरे और श्रीविष्णुके साथ महादेवजीको ले गये। तदनन्तर बृहस्पति आदि विद्वान् बड़े उत्साहसे सम्पन्न हो कन्यादानोचित लग्नकी प्रतीक्षा करने लगे। गर्गने पुण्याहवाचन करते हुए पार्वतीजीकी अंजलिमें चावल भरे और शिवजीके ऊपर अक्षत छोड़ा। परम उदार सुमुखी पार्वतीने दही, अक्षत, कुश और जलसे वहाँ रुद्रदेवका पूजन किया। जिनके लिये शिवाने बड़ी भारी तपस्या की थी, उन भगवान् शिवको बड़े प्रेमसे देखती हुई वे वहाँ अत्यन्त शोभा पा रही थीं। फिर मेरे और गर्गादि मुनियोंके कहनेसे शम्भुने लोकाचारवश शिवाका पूजन किया। इस प्रकार परस्पर पूजन करते हुए वे दोनों जगन्मय पार्वती-परमेश्वर वहाँ सुशोभित हो रहे थे। त्रिभुवनकी शोभासे सम्पन्न हो परस्पर देखते हुए उन दोनों दम्पतिकी लक्ष्मी आदि देवियोंने विशेषरूपसे आरती उतारीं।
(अध्याय ४७)


शिव-पार्वतीके विवाहका आरम्भ, हिमालयके द्वारा शिवके गोत्रके विषयमें प्रश्न होनेपर नारदजीके द्वारा उत्तर, हिमालयका कन्यादान करके शिवको दहेज देना तथा शिवाका अभिषेक

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इसी समय वहाँ गर्गाचार्यसे प्रेरित हो मेनासहित हिमवान्ने कन्यादानका कार्य आरम्भ किया। उस समय वस्त्राभूषणोंसे विभूषित महाभागा मेना सोनेका कलश लिये पति हिमवान्के दाहिने भागमें बैठीं। तत्पश्चात् पुरोहितसहित हर्षसे भरे हुए शैलराजने पाद्य आदिके द्वारा वरका पूजन करके वस्त्र, चन्दन और आभूषणोंद्वारा उनका वरण किया। इसके बाद हिमाचलने ब्राह्मणोंसे कहा—'आपलोग तिथि आदिके कीर्तनपूर्वक कन्यादानके संकल्पवाक्यका प्रयोग बोलें। उसके लिये अवसर आ गया है।' वे सब द्विजश्रेष्ठ कालके ज्ञाता थे। अतः 'तथास्तु' कहकर वे सब बड़ी प्रसन्नताके साथ तिथि आदिका कीर्तन करने लगे। तदनन्तर सुन्दर लीला करनेवाले परमेश्वर शम्भुके द्वारा मन-ही-मन प्रेरित हो हिमाचलने प्रसन्नतापूर्वक हँसकर उनसे कहा—'शम्भो! आप अपने गोत्रका परिचय दें। प्रवर, कुल, नाम, वेद और शाखाका प्रतिपादन करें। अब अधिक समय न बितायें।'

हिमाचलकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर सुमुख होकर भी विमुख हो गये। अशोचनीय होकर भी तत्काल शोचनीय