शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३५५
असुरराज तारकको मारकर तथा देवोंको वर प्रदान करके तुमने हम सबको तथा चराचर जगत्को सुखी कर दिया। अब तुम्हें परम प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिता पार्वती और शंकरका दर्शन करनेके लिये शिवके निवासभूत कैलासपर चलना चाहिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! तदनन्तर सब देवताओंके साथ विमानपर चढ़कर कुमार स्कन्द शिवजीके समीप कैलास पहुँच गये। उस समय शिव-शिवाने बड़ा आनन्द मनाया। देवताओंने शिवजीकी स्तुति की। शिवजीने उन्हें वरदान तथा अभयदान देकर विदा किया। मुने ! उस अवसरपर देवताओंको परम आनन्द प्राप्त हुआ। वे शिव, पार्वती तथा शंकरनन्दन कुमारके रमणीय यशका बखान करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। इधर परमेश्वर शिव भी शिवा, कुमार तथा गणोंके साथ आनन्दपूर्वक उस पर्वतपर निवास करने लगे। मुने ! इस प्रकार जो शिव-भक्तिसे ओतप्रोत, सुखदायक एवं दिव्य है, कुमारका वह सारा चरित्र मैंने तुमसे वर्णन कर दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो ?
(अध्याय ९—१२)
शिवाका अपनी मैलसे गणेशको उत्पन्न करके द्वारपाल-पदपर नियुक्त करना, गणेशद्वारा शिवजीके रोके जानेपर उनका शिवगणोंके साथ भयंकर संग्राम, शिवजीद्वारा गणेशका शिरश्छेदन, कुपित हुई शिवाका शक्तियोंको उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको प्रसन्न करना, उनके द्वारा पुत्रको जिलाये जानेकी बात कही जानेपर शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड़से जोड़कर उन्हें जीवित करना
सूतजी कहते हैं—तारकारि कुमारके उत्तम एवं अद्भुत वृत्तान्तको सुनकर नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने पुनः प्रेमपूर्वक ब्रह्माजीसे पूछा।
नारदजी बोले—देवदेव ! आप तो शिव-सम्बन्धी ज्ञानके अथाह सागर हैं। प्रजानाथ ! मैंने स्वामी कार्तिकके सद्वृत्तान्तको जो अमृतसे भी उत्तम है, सुन लिया। अब गणेशका उत्तम चरित्र सुनना चाहता हूँ। आप उनका जन्म-वृत्तान्त तथा दिव्य चरित्र, जो सम्पूर्ण मंगलोंके लिये भी मंगल-स्वरूप है, वर्णन कीजिये।
सूतजी कहते हैं—महामुनि नारदका ऐसा वचन सुनकर ब्रह्माजीका मन हर्षसे गद्गद हो गया। वे शिवजीका स्मरण करके बोले।
ब्रह्माजीने कहा—नारद ! पहले जो मैंने विधिपूर्वक गणेशकी उत्पत्तिका वर्णन किया था कि शनिकी दृष्टि पड़नेसे गणेशका मस्तक कट गया था, तब उसपर हाथीका
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