भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 374

३६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

जलको अभिमन्त्रित किया, फिर शिवजीका स्मरण करके उस उत्तम जलको बालकके शरीरपर छिड़क दिया। उस जलका स्पर्श होते ही वह बालक शिवेच्छासे शीघ्र ही चेतनायुक्त होकर जीवित हो गया और सोये हुएकी तरह उठ बैठा। वह सौभाग्यशाली बालक अत्यन्त सुन्दर था। उसका मुख हाथीका-सा था। शरीरका रंग हरा-लाल था। चेहरेपर प्रसन्नता खेल रही थी। उसकी आकृति कमनीय थी और उसकी सुन्दर प्रभा फैल रही थी। मुनीश्वर ! पार्वतीनन्दन उस बालकको जीवित देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग आनन्दमग्न हो गये और सारा दुःख विलीन हो गया। तब हर्ष-विभोर होकर सभी लोगोंने उस बालकको पार्वतीजीको दिखाया। अपने पुत्रको जीवित देखकर पार्वतीजी परम प्रसन्न हुईं।
(अध्याय १३—१८)


पार्वतीद्वारा गणेशजीको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्ष-पद प्रदान और गणेशचतुर्थीव्रतका वर्णन, तत्पश्चात् सभी देवताओंका उनकी स्तुति करके हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट जाना

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जब विकृत स्वरूपवाले गिरिजा-पुत्र गजानन व्यग्रतारहित होकर जीवित हो उठे, तब गणनायक देवोंने उनका अभिषेक किया। अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवी आनन्दमग्न हो गयीं और उन्होंने हर्षातिरेकसे उस बालकको दोनों हाथोंसे पकड़कर छातीसे लगा लिया। फिर अम्बिकाने प्रसन्न होकर अपने पुत्र गणेशको अनेक प्रकारके वस्त्र और आभूषण प्रदान किये। तदनन्तर सिद्धियोंने अनेकों विधि-विधानसे उनका पूजन किया और माताने अपने सर्वदुःखहारी हाथसे उनके अंगोंका स्पर्श किया। इस प्रकार शिव-पत्नी पार्वतीदेवीने अपने पुत्रका सत्कार करके उसका मुख चूमा और प्रेमपूर्वक उसे वरदान देते हुए कहा—‘बेटा! इस समय तुझे बड़ा कष्ट झेलना पड़ा है। किंतु अब तू कृतकृत्य हो गया है। तू धन्य है। अबसे सम्पूर्ण देवताओंमें तेरी अग्रपूजा होती रहेगी और तुझे कभी दुःखका सामना